दलितों पर अत्याचार का रुप है भीमा-कोरेगांव

साभार: विकिपीडिया

भीमा-कोरेगांव का इतिहास: पुणे के पास भीमा-कोरेगांव एक जगह है, जहां भीमा-कोरेगांव लड़ाई 1817 में अंग्रेजों और पेशवाओं के बीच हुई, इसमें अंग्रेजों की तरफ से महारों ने पेशवाओं के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी। आपको बता दें कि महार महाराष्ट्र की दलित जाति है। इस लड़ाई में अंग्रेजों की जीत हुई, जिसके कारण वहां मारे गए महारों की याद में एक स्मारक बनवाया गया। इस स्मारक पर एकत्र होकर हर साल महार समाज अपनी जीत को मनाते हैं। 1 जनवरी 2018 को इस लड़ाई को 200 साल होने के उपलक्ष्य में लाखों की संख्या में लोग यहां मौजूद हुए थे। तब यहाँ हिंसा हुई जिसमें जानमाल का भारी नुकसान हुआ, जिसके कारण दलित संगठनों ने मुंबई बंद की घोषणा की और मुंबई बंद भी रहा।

दलित बनाम हिंदुत्ववादी विचारधारा: 1 जनवरी को हुई हिंसा को रंग हिन्दू  बनाम दलित दिया जा रहा है, जबकि ये घटना हिन्दुत्वादी बनाम दलित थी। इस हिंसा को आम हिन्दू और दलित दिखाकर हिन्दुत्वादी  विचार को समाज में लागू करना है। इस विचार के तहत बड़ी मानी जाने वाली जातियां अलग-अलग सामाजिक प्रथाओं के ज़रिये कमज़ोर वर्ग और दलितों का शोषण करती आई हैं। महारों को देशद्रोही बताया जा रहा है, क्योंकि उन्होंने अंग्रेजों का साथ दिया था, जबकि उस समय भारत देश की अवधारण ही नहीं थी। उस समय देश कई राजाओं और नवाबों की राजशाही में बांटा था। भारत तो आजादी के बाद सब रियासतों को मिलकर बना है। महारों को देशद्रोही कहनेवाले  शायद ये नहीं जानते हैं कि देश की सेना में महार रेजिमेंट भी है, जो अपनी वीरता के लिए बहुत से पुरस्कारों से सम्मानित है। हालांकि इस हिंसा को फैलाने का आरोप अनुसार हिंदुत्ववादी संगठन हिंदू आघाडी, ऑल हिंदू फ्रंट पर है। जो देश में दलित आंदोलन को बढ़ने से रोकना चाहते हैं। पिछले दिनों हुई दलित विरोधी घटनाएं, रोहित वेमुला की हत्या और ऊना में गौ रक्षक समिति के सदस्यों द्वारा दलित युवकों को पीटने की घटना ,सहारनपुर में दलित घरों को जलाने जैसी घटना देश में बाबासाहेब अंबेडकर के बाद दलित हितों की पैरवी करने वाले नेता की मांग कर रहा है। अब देखना ये हैं कि दो साल पहले हुई ऊना में दलित हिंसा के विरोध में हुये आंदोलन में सामने आए जिग्नेश मेवाणी (गुजरात की वडगाम सीट से जिग्नेश निर्दलीय विधायक भी चुने गए हैं) और सहारनपुर दलित हिंसा में सामने आई   भीम आर्मी के चीफ चन्द्रशेखर रावण जैसे लोग दलित राजनीति की डोर संभाल पाते हैं।

उत्तर प्रदेश दलित हिंसा में सबसे आगे: अगर आप सोचते हैं कि देश में जातिवाद खत्म हो गया है, तो ये आपकी भूल है। राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के 2016 के आंकड़ों पर नजर दें  तो हकीकत मालूम हो जाएगी। 2016 में दलितों के खिलाफ अत्याचार के कुल 40,801 मामले लिखे गए। वहीं ये आंकड़े 2015 में 38,670 थे। अगर इन आंकड़ों को राज्यों के हिसाब से देखें तो उत्तर प्रदेश का नाम दलित अत्यचार में सबसे ऊपर है। 2016 में अकेले उत्तर प्रदेश में 10426 मामले दर्ज हुए। देश भर में दर्ज हुए पूरे मामलों का ये 25.6 प्रतिशत है। बुंदेलखंड के बांदा जिले के तिदंवा गांव में ग्राम पंचायत चुनाव 2015 में कमला देवी नाम की दलित प्रत्याशी उतरी तो चुनावी रंजिश के कारण राजू मिश्रा ने उनके साथ कथित रूप से मारपीट के साथ छेड़छाड़ की कोशिश भी की। आरोप है कि राजू मिश्रा ने जाति और पैसों के बल पर कमला देवी के परिवार के सदस्यों के साथ भी मार-पिटाई करके उन लोगों को इस हद तक डराया कि पीड़ित परिवार ने गांव छोड़ने का मन बना लिया था। पीड़ित परिवार का कहना था कि उन्होंने राजू मिश्रा की शिकायत जब थाने में की तो उनकी शिकायत लिखी नहीं गई। पुलिस एक बार गश्त लगाकर खानापूर्ति कर गई। जनवरी 2018 को बांदा जिले के जसपुरा ब्लॉक के नरौली गांव के दलित प्रधान के पति की हत्या का मामला सामने आया है। परिवारवालों के अनुसार हत्या ठाकुर जाति के लोगों ने की है। इस मामले पर नरैनी के पूर्व विधायक गया चरण दिनकर ने बताया कि मृतक की पत्नी प्रधानी का चुनाव जीत गई थी, पर प्रधानी का काम मृतक देखता था। हत्या के आरोपी रामचरण, रामनरेश, रामकिशन, रामनारायण, रामसफल गांव में शराब पीकर हंगामा करते थे, जिसका विरोध करने के कारण रामसजीवन की हत्या हो गई। ऐसी हजारों हिंसा की घटनाएं गांवों और शहरों में जाति के नाम पर होती रहती हैं। चाहे किस्सा भीमा कोरेगांव हो या कोई और।

अल्का मनराल