डकैत के नाम मन्दिर? बुंदेलखंड के मशहूर डकैत बना कबराहा का देवता

जिला चित्रकूट, गांव कबराहा, 31 दिसम्बर 2016। ददुआ चित्रकूट में जाना पहचाना एक ऐसा नाम है, जो सबकी जुबान पर चढ़ा है। पर उसको लेकर लोगों का कभी भी एक-सा मत नहीं है। कुछ लोग उसे ‘गरीबों का रॉबिन हुड’ कहते हैं, तो कुछ एक बड़ा शातिर अपराधी। इन सब बातों के बावजूद फतेहपुर के नरसिंहपुर कबराहा गांव में ददुआ का एक मंदिर है। मंदिर में लगी मूर्ति और पुलिस के रिकॉर्ड में लगी फोटो के अलावा किसी ने ददुआ का चेहरा नहीं देखा है। ददुआ का असली नाम शिवकुमार पटेल है, जबकि उसे सब ददुआ के नाम से ही जानते हैं।

ददुआ इस इलाके का एक खौफनाक डकैत था, जिस पर उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के पुलिस थाने में हत्या, डकैती और अपहरण के चार सौ केस थे। पर फिर भी ऐसे खौफनाक डकैत के नाम पर मंदिर बनाने की वजह बताते हुए वहां उनका दर्शन करने आए हुए उमेश सिंह कहते हैं, “वह गरीबों के मसीहा थे। उन्होंने गरीबों की बेटियों और बहनों की रक्षा की थी।”

रनकुमार शर्मा कहते हैं, “इस इलाके में ददुआ को इस मूर्ति के अलावा कभी नहीं देखा। ददुआ कितना गरीबों का मददगार था और कितना खतरनाक था। ये सब बातें आंखों देखी नहीं हैं बल्कि सुनी-सुनाई है।” रनकुमार इस मंदिर को ही ददुआ की कबराहा गांव को उसकी बड़ी देन मानते हैं।

इस मंदिर के निर्माण की कहानी भी एक फिल्मी कहानी की तरह है। विवेक कुमार बताते है कि वह इस क्षेत्र में आते रहते थे। ऐसे ही एक दिन वह यहां आए थे। तो पुलिस को उनके यहां आने की खबर लग गई, जिसके बाद वह पुलिस से घिरे होने के बावजूद वहां से बच निकले। उन्हें यहां से सही बचने की मन्नत मांगी थी कि अगर यहां से सही बच गया तो यहां एक मंदिर का निर्माण करवाऊंगा।

पर ददुआ का मंदिर बनना भी इतना आसान नहीं था। मंदिर के निर्माण के समय पटेल बहुलक इस क्षेत्र में ब्राह्मण समुदाय ने विरोध किया था। ददुआ को राजनीति से भी समर्थन प्राप्त था, इसकी वजह हैं, उनके भाई जो बालकुमार पटेल समाजवादी पार्टी के सांसद रह चुके है और वह इस मंदिर के संचालक भी हैं। वहीं ददुआ के बेटे वीर सिंह मऊ मानिकपुर से विधायक हैं और साथ ही मुलायम सिंह की उत्तर प्रदेश विधानसभा उम्मीदवारों की सूची में चित्रकूट से वीर सिंह को टिकट मिल गया है।

ददुआ की कहानी सुनने के बाद दिमाग में ये सवाल आना लाजमी हैं कि इतना रहस्यमय जीवन रखने वाला ददुआ आज कहां है। पर लोगों और पुलिस के रिकॉर्ड के अनुसार वह 2007 में पुलिस मुठभेड़ में मारा गया।

खैर बुंदेलखण्ड में अपनी अलग सरकार चलने वाले ददुआ के नाम को जिंदा रखने के लिए उसके भाई और बेटे ने इस मंदिर का निर्माण किया है और इस मंदिर में लाखों की संख्या में लोग उनके दर्शन को आते हैं। वहीं पुलिस की फाइलों में ददुआ के अपराधों के कारनामे फाइलों में बन्द हैं।

रिपोर्ट- खबर लहरिया ब्यूरो

29/12/2016 को प्रकाशित