तीन तलाक बिल पर असहमतियों के साथ सामने आया मुस्लिम महिलाओं का संगठन

साभार: फेसबुक / मैजिस लीगल सेंटर

लिंग न्याय और अल्पसंख्यक अधिकारों से संबंधित कारणों का प्रमाण देते हुए, मुसलमान महिलाओं का एक संगठन, मजलिस लीगल सेंटर, तीन तलाक विधेयक पर सवाल खड़ा कर रही है उनका कहना है की 28 दिसंबर, 2017 को जिस तरीके से अपराधी तीन तलाक को जल्दबाजी में पेश किया गया, वे उसके पक्ष में नहीं हैं।
उनका कहना है की इस विधेयक का उद्देश्य मुसलमान महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करना है, लेकिन अगर इसे अपने मौजूदा स्वरूप में पारित किया गया है, तो इससे समुदाय को नुक्सान  होगा। उनका कहना है की इसमें जल्दबाजी नहीं होनी चाहिए, और इसपर दोबारा विचार होना चाहिए।
 वर्तमान विधेयक के बारे में संगठन की असहमतियां इस प्रकार है
इसमें कई विरोधाभास और विसंगतियों हैं
इससे मुस्लिम महिलाओं को एक नया क़ानून बनाया जाता है जो पतियों को जेल में डाल देगा।
यह आपराधिक आरोप दर्ज करने के लिए तीसरे व्यक्ति को शक्ति देता है, जो कि बहुत खतरनाक हो सकता है
यह मामले को समाप्त करने के लिए समय अवधि को स्पष्ट नहीं करता है।
यह स्पष्ट नहीं करता है कि जब महिला का पति जेल में होगा तब महिला को कौन जीविका प्रदान करेगा।
अगस्त, 2017 में माननीय सुप्रीम कोर्ट ने तीन बारतालाकशब्द का अपमान रद्द कर दिया है, जिसका अर्थ है कि उनकी शादी बरकरार है। चूंकि शादी बरकरार है, इसलिए मुस्लिम महिलाएं अन्य सभी महिलाओं की तरह कानून में एक आपराधिक (आईपीसी की एस 498 पत्नियों के लिए क्रूरता) और सिविल (महिला घरेलू हिंसा अधिनियम की सुरक्षा (पीडब्ल्यूडीवीए) 2005 को सुरक्षित रखती है। घरेलू हिंसा के रखरखाव, निवास, हिंसा से सुरक्षा और उनके बच्चों की हिरासत के लिए सभी महिलाओं के अधिकार) यदि वे घरेलू हिंसा का सामना करती हैं तो हमारा मानना हैं कि मुस्लिम महिलाओं को अपने अधिकारों की रक्षा के लिए इन दोनों कानूनों का सहारा लेना चाहिए।
हम अधोहस्ताक्षरी द्वारा अपनी असहमति जता कर इस विधयक पर चर्चा करने के लिए, इसे एक चयन समिति को भेजना चाहते हैं।