तिरिंग गांव जिसकी पहचान हैं बेटियां!

साभार: बीबीसी हिंदी
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झारखंड में लौहनगरी जमशेदपुर से 26 किलोमीटर दूर तिरिंग गांव की पहचान अचानक से बदल गई है। वहां घरों में मिट्टी की दीवारों पर टंगे नेम प्लेट पर पूजा, चांदनी, सुजला, फूलमनी, पायल, टुसू के नाम देखकर चौंकने की ज़रूरत नहीं है।
दरअसल, महिला सशक्तीकरण को लेकर देश के कई हिस्सों में बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ अभियान चल रहा है, लेकिन तिरिंग गांव में ‘मेरी बेटी, मेरी पहचान’ अभियान चलाया जा रहा है।
नेम प्लेट पर लड़कियों के नाम के साथ उनकी मां के नाम भी लिखे गए हैं।
इस सरकारी अभियान को जमशेदपुर के डिप्टी कलेक्टर संजय कुमार चला रहे हैं जो ज़िला जनसंपर्क अधिकारी का काम भी देख रहे हैं।
बहुल आदिवासी 90 घरों वाला तिरिंग राज्य का पहला गांव है जहां घरों की पहचान बेटियों के नाम से होने लगी है। यहां के लोग खेती-मजदूरी करते हैं।
आदिवासी परंपरा के तहत अधिकतर घरों की दीवारों की पुताई विभिन्न रंगों से की गई है। नेम प्लेट में पीले रंग की पट्टी पर नीले रंग से लड़कियों के नाम लिखे हैं।
इस अभियान को शुरू करने से पहले उन्होंने ग्राम सभा, स्थानीय स्कूल के शिक्षकों, पत्रकारों, आंगनवाड़ी सेविका, बाल विकास परियोजना अधिकारी के साथ रायशुमारी कर सहमति बनाई। अभियान को शुरू करने से पहले गांव में रैली निकाली गई।
प्राथमिक विद्यालय तिरिंग के शिक्षक सुनील कुमार यादव कहते हैं- ‘तीन साल पहले झारखंड में लड़कियों के सरकारी स्कूलों में ‘पहले पढ़ाई फिर विदाई’ का नारा दिया गया था, जो बाद में देश भर में सुर्खियों में आया। ‘
2011 की जनगणना के मुताबिक तिरिंग गांव का शिशु लिंगानुपात एक हज़ार लड़कों पर 768 लड़कियां था और महिलाओं में साक्षरता दर महज़ पचास फ़ीसदी थी। पूरे जिले में महिलाओं की साक्षरता 67 फ़ीसदी तक थी।
डिप्टी कलेक्टर संजय कुमार के मुताबिक उन्होंने गांवों की आबादी से लेकर अन्य पहलुओं पर आंकड़े इकट्ठा किए जिससे ये लगा कि शुरूआत तिरिंग गांव से होनी चाहिए।
हालांकि ये अभियान कुछ मर्दों को कभी-कभार खटकता है, लेकिन ग्राम प्रधान उमेश सरदार और मुखिया सावित्री देवी लोगों से पुराने ख्यालों से निकलने की सलाह देते हैं।