ट्रेन और चना ही हमारी जिन्दगी है

Kshetriya - Karvi Chanewali of Manikpurबुन्देलखण्ड के चित्रकूट जिला के मानिकपुर इलाके में लगभग दो सौ दलित परिवार हैं (खटिकों का है) जिसमें से पचास ऐसी महिलाएं हंै जो रोज मानिकपुर स्टेषन में चना लेकर बेचने के लिए जाती है। महिलायें लगभग पचास से सत्तर किलोमीटर दूर चना बेचने जाती हैं।
मानिकपुर के इन्द्रानगर मुहल्ले कि बेलिया ने बताया कि वह सुबह तीन बजे उठती है और घर का पूरा काम निपटा के पांच बजे रेलवे स्टेषन पहुंच जाती है। “कभी ट्रेन टाइम पर रहती है तो कभी लेट इस से मेरा चना कभी कभी बच जाता है। अगर दिन भर में दो सौ रूपये कमाये तो पचास रूपये टी.टी. और पुलिस को घूस देने में निकल जाते है। अगर पैसा न दिया तो गाड़ी से उतारने और जेल भेजने की धमकी देते है।” गांधी नगर की रजुइया का कहना है कि हम गरीबों के पास खाने कमाने के लिए चना के आलावा कोई जरिया नहीं है। सरकार ने हमारा राषन कार्ड भी नहीं बनवाया है। हमारे मोहल्ले कस्बा में आते हैं इस लिए हमे मनरेगा योजना के तहत काम नहीं मिलता। सुबह चार बजे की निकली कभी बारह बजे तो कभी एक बजे रात घर वापस आती हूं। घर पहुंच काम निपटाती फिर दो घन्टे सोती हूं, फिर ट्रेन में डलिया लेकर चढ़ जाती हूं। यही हम चना बेचने वालों की जिन्दगी है।
इस मामले में पूर्व ए.डी.एम. केषवदास का कहना है कि चित्रकूट जिले में बेरोजगारी तो है परन्तु यहां के मर्द काम करने से भी डरतें है। इसलिए महिलायें अपना परिवार चलाने को मजबूर रहती है। शासन प्रषासन की तरफ से जो भी सहयोग होगा तो जरूर किया जायेगा। मानिकपुर टाउन एरिया के बाबू राधेष्याम का कहना है कि राषन कार्ड की जंाच चल रहे है, पात्रों के राशन कार्ड जरूर बनायें जायेंगें।