झांसी पहुंचा अफ्रीकन राजमहल सर्कस

जिला झाँसी, शहर झाँसी में अफ्रीकन राजमहल सर्कस। देश-विदेश से आय इते कला कार और सबको दिखा राये अपनी कला।और अपनी कला से सबको दिल खुस कर रए।जा सर्कस में कछु जने एसे भी हें।के उने मजबूरी में जो काम करने पर रओ।और कछु अपनी इच्छा से काम कर राये।सर्कस कों चलाबे वाले सुरेश पहलवान ने बताई के हम बाँदा के रेबे वाले हें।हमे सर्कस को काम करत करत तीस साल हो गयी।हम पूरे देश विदेश में जात सर्कस करबे के लाने। महाराट्र आंध्रप्रदेश सब जगह जात और अलग अलग तरा के खेल दिखा के लोगो का मनोरंजन करत।और हम तीन शिफ्ट लगात हें।एक से चार,चार से सात,सात से दस।और एक बार में कम से कम एक बार में दो सो आदमी आत और जा में कोनऊ हमाय टिकिट दो सौ सौ और पचास की भी रती। और हमाओ जो कार्य क्रम देखबे के लाने भौत दूर दूर से आदमी आत।
सर्कस में आई असम कि सोनिया ने बताई के हम असम के हें।और हमाई ससुराल बंगाल में हें।हम अपने मताई बाप के संगे आय ते।मताई हमाई सर्कस में काम करत ती। और पापा तम्बू बनाबे को काम करत ते। हम स्कूल नई गये। और छोटे से सर्कस में काम कर रये। और अब हैई अच्छो लगत। और कोनऊ परेशानी नईया और खाना सब अच्छो मिलत।
विशाल ने बताई के हम बिटनापुर के हें। और जब हम बारा तेरा साल के हते तब से काम कर रए। अब हमे जोई काम अच्छो लगत और हम जोई करत जैसे अगर आठ दस दिन हो जात।तो डर लगत के एसो न होबे के हम भूल जाये। और सब आदमीयन के सामने हसी होबे। पहले डर लगत तो। लेकिन अब नई लगत अब तो आदत पर गई और अच्छो भी लगत अब।
मंजू ने बताई के हम भी बारह तेरह साल के हते जब से सर्कस में काम कर रए। हमने पढाई केबल पांच तक करी बाके बाद हम सर्कस में आ गये थे। हमाय बड़े पापा की बेटी भी सर्कस में काम करत। उसके साथ आये ते।
कुसुम ने बताई के जब हम आठ दस साल के हते तब आये ते। और हमाई मताई काम करबे के लाने लेयाई ती। के पईसा कमाओ। अब हमे यही अच्छो लगत हें। घर नई जात अब हम।
रुक्सार ने बताई के हमाई मम्मी सर्कस की मुख्य हती और हमाय पापा सर्कस में गाडी को काम करत ते। तो हम भी सर्कस में आये थे। और हमाय बच्चे तो पढाई करत। और हम लोगन कि शादी भी सर्कस में ही हो जात। और हमाओ काम सर्कस में साईकिल और कप प्लेट का खेल करबो हें। एसे ही सबके अलग अलग तरा के काम हें जेसे कोई डांस करत तो कोई बोतल बालो या जोकर कओ करत। एसे सबके अलग अलग हें।
फिरोज खान ने बताई के हम ग्वालियर इन्दोर झांसी लखनऊ एसी जगह जात हें। जहां हमाओ अच्छे से सर्कस चलत काय के अगर नई चले तो फिर सबके पईसा किते से मिल हें। जेसे कोऊ को पंद्रह हजार कोऊ को बारा हजार और कोऊ को दस हजार। एसे पईसा दये जात हें। मेहनत के हिसाब से। और हम बहार से लडकिया भी लेयात। जेसे अपने गांव से अगल बगल से लड़का लेयात ।जी की अगर मर्जी होत तो। और हमाय सर्कस के सब लोग अच्छे हें एक दूसरे से प्रेम करत। और सब मिल के रत अच्छो भी लगत।
रिपोर्टर- लाली और पवित्रा
01/08/2016 को प्रकाशित

झांसी पहुंचा अफ्रीकन राजमहल सर्कस