झांसी के सिमरावारी गांव में मृतकों के अंतिम संस्कार के लिए कोई इंतज़ाम नहीं

जिला झांसी, गांव सिमरावारी इते के आदमियन को अंतिम संस्कार के लाने न तो शमशान घाट हे न कब्रिस्तान हे। आदमी केऊ साल से जाको इंतजाम करबे में लगे।
लेकिन अबे तक कोनऊ सुविधा नई भई। अगर प्रधान से कहो तो बे कत के जाको प्रस्ताव रखो जेहे लेकिन कछु नई होत।
मदीना ने बताई के इते अंतिम संस्कार के लाने कोनऊ सुविधा नईया। हम ओरे तो मुसलमान हे तो अगर कोऊ मर जात तो बबीना लेके जात काय के इते कितऊ जघई नईया।
केऊ बार एस डी एम नो भी गये झांसी में भी दरखास दई लेकिन कोनऊ सुनवाई नई भई। न प्रधान सुनत जब वोट मागबे आत सो कत के बनवा देहे और जीत जात सो फिर देखबे तक नई आत।
डॉक्टर एम ए आजाद ने बताई के हम काफी लम्बे समय से जा बात को लेके चले आ रए सन 1990 से डी एम, एस डी एम, लखनऊ मुख्य सचिवालय, मुख्यमंत्री अखलेश सिंह यादव तक सूचना दई। लेकिन कोनऊ सुनवाई नई हो रई।
उते से सूचना आत के पंद्रह दिन के अंदर नाप हो जेहे जो खली जघा हे बामे पक्की बाऊंड्री बनबा देहे। लेकिन न तो आज तक नाप भई और न बाऊंड्री बनी जमीन होत भये पे भी।
इते जो भी सूचना आत सो लेखपाल को रिपोर्ट लगाने परत तो बे गलत रिपोर्ट लगा के भेज डेट के इते जमीन नईया।
मीरा ने बताई के भोत परेशानी होत पहले नदी पे ले जात ते सो उते कर यात ते अंतिम संस्कार। अब उते घर बन गये सो अब निकर बे तक के लाने जघा नईया।
संतोष गुप्ता ने बताई के अगर बरसात में कोऊ ख़तम होत तो भोत परेशानी होत अगर पानी बरस जात तो छह छह घंटा तक इंतजार करने परत के पानी बंद हो जाबे फिर अंतिम संस्कार करबे जाबे।
अबे हाल की बात एक अम्बेडकर नगर की उते एक बुजुर्ग आदमी ख़त्म हो गओ तो। तो हम ओरे छह, सात घंटा बेठे रए के पानी बंद हो जाबे तब अंतिम संस्कार करबे।
लेकिन पानी बंद नई भओ फिर हम ओरे दूसरे गांव में ले गये उते हम ओरन ने उनको अंतिम संस्कार करो गाडी बुक करके ले गये ते। अगर कोनाऊ गरीब आदमी होबे तो बो तो कितऊ नही ले जा पेहे।

रिपोर्टर- सफीना

30/09/2016 को प्रकाशित