जूतों की दूकान, पर मन कवि का, मिलिए बाराबंकी के सतीश कुमार उर्फ़ तरंग से

जिला बाराबंकी, नबावगंज कोठी जूता व्यवसाई सतीश कुमार उर्फ़ तरंग का बचपन से ही कविता मा रूचि रही। बचपन मा पिता के मौत के बाद उनकै पढ़ाई छूट गए अउर ये जूता का व्यवसाय मा लग गये।
लकिन कवि मन का कउनौ भी परेशानी बदल नाय सकत। 55 साल कै तरंग नवाबगंज कोठी कै रहै वाले हुवय। आज इनकै कविता मनई का मनोरंजन के साथ ही सन्देश भी दिया थिन।
सतीश कुमार कै कहब बाय कि प्रयास करत करत स्कूल मा बढ़ चढ़ के हिस्सा लियत रहेन। अच्छा प्रदर्शन करै लागेन। जब मनइन से वाह वाही मिलै लाग। वकरे बाद मन लागै लाग कविता लिखै मा। कविता जवन हुआथै वकै सही चित्रण हुवय का चाही। कवि हुवय या साहित्यकार जब उसकी कलम चलै। निश्पक्ष हुवय का चाही।
अंतर नहीं दिखता है गीता कुरान में। कुछ लोग सेंक रहे हैं स्वार्थ कि रोटियाँ, अंतर बना दिया है आज जान जान में।।
सतीश कुमार कै कहब बाय कि सीतापुर विस्वा गए वहि आपन कविता पढ़ेंन। बाराबंकी हैदरगढ़ जैसे कइयो जगह आपन कविता पढ़े कै अवसर मिला।
कविता से कउनौ आय कै स्रोत नाय बाय। बिना व्यवसाय बिना मेहनत परिवार कै गाड़ी नाय चलत। एसे जूता कै दूकान करे हई। अउर अपने वाणी कै प्रदर्शन भी करत हई।

रिपोर्टर- नसरीन

03/05/2017 को प्रकाशित