जातिवाद और सुस्त शासन की बली चढ़ी जीशा…

राजेश्वरी 28 अप्रैल की रात को हमेशा याद रखेंगी। करीब साढ़े आठ बजे जब राजेश्वरी मजदूरी के काम से अपने घर, जो केरल के पेराम्बवूर शहर में है, वापस आई तो उन्हें अपनी बेटी जीशा की लाश कमरे में बिना कपड़ों के मिली।
उनकी 29 साल की बेटी की हत्या हुई थी। जीशा के शरीर पर आधे कपड़े थे और खून बह रहा था।

यह सब इतना भयानक था कि जीशा की माँ राजेश्वरी चीखने लगीं। जीशा के शरीर पर 38 घाव थे, उसके गुप्तांक से खून बह रहा था और पेट की आंते बाहर निकली हुईं थीं।

उसकी पीठ पर चाकू से वार किया गया था और उनके सर पर भारी चीज से चोट की गई थी। जिससे उसकी मौत हो गई।

इस पूरे दृश्य को देख कर प्रतीत हो रहा था जैसे जीशा के साथ बलात्कार हुआ है।

लगभग तीन साल पहले दिसम्बर 2012 में ज्योति जिसे सभी ‘निर्भया’ के नाम से जानते हैं, के साथ भी इसी तरह की हिंसा और बलात्कार हुआ था।

उस हादसे के बाद महिला हिंसा पर खूब खलबली मची थी और निर्भया के नाम का कानून बना।
लेकिन आज, जीशा के साथ जो हुआ है वह देश भर में फिर से महिलाओं की सुरक्षा पर सवाल खड़ा करता है।
जीशा के मामले ने फिर से बहुत सारे सवाल हमारी कानून व्यवस्था और जातिवाद समाज के सामने ला कर रख दिए हैं। आखिर क्यों भारत देश में महिला हिंसा इतनी आम बात हो गई है?

यह मात्र बलात्कार और हत्या की ही बात नहीं है। जीशा और उनके परिवार ने जातिगत भेदभाव भी झेला है।
इस जातिवाद के कारण ही पुलिस की कारवाही भी धीरे से शुरू हुई। न ही तुरंत एफआईआर दर्ज हुई न ही मेडिकल हुआ।
जब तक राजनैतिक दलों और मीडिया का दबाव नहीं पड़ा तब तक पुलिस बैठी ही रही।
क्या जीशा हत्याकांड भी अखबारों का शीर्षक बनके रह जाएगा?