जय भीम, जय मीम का नारा लेकर चले प्रदीप कोरी

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’दलितों और मुसलामानों की स्थिति खेत में हरुवा के जैसी है। हरुवा आपके खेत में पूरा काम करता है, बदले में उसे थोड़ा सा हिस्सा मिलता है। हरुवा सिर्फ काम करता है, अपनी बात कभी नहीं रखता। हमारे देश में राजनीतिक पार्टियों में दलित और मुसलमान भी हरुवा हैं, वो अपनी बात और अपना दर्द नहीं रख सकते, सिर्फ पार्टी का काम करते हैं। एम आई एम पार्टी में ऐसा नहीं है। यह हमारी पार्टी है। हमने दर्द झेला है तो उसका निवारण भी हम करेंगे। क्या राहुल गांधी या सोनिया गांधी ने गरीबी देखी है? प्रधानमन्त्री चायवाला होने की बात करते हैं, लेकिन असल में उन्होंने क्या किया है? जिन लोगों ने गरीबी नहीं देखी, वो गरीबी का हल कैसे करेंगे?’

32 साल के प्रदीप कोरी की यह बात उनके चुनाव की रणनीति की ओर इशारा करती है। 13 फरवरी को उत्तर प्रदेश में होने वाले उपचुनावों में फैज़़ाबाद के बीकापुर क्षेत्र से प्रदीप कोरी एम आई एम पार्टी के उम्मीदवार हैं। बीकापुर में राष्ट्रीय लोक दल (रालोद), भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और समाजवादी पार्टी (सपा) के बीच मुकाबला होने जा रहा है।

बीकापुर को सपा के गढ़ के रूप में देखा जाता है, इससे दिवगंत मित्रसेन यादव के पुत्र आनंद सेन चुनावी दौड़ में हैं। दूसरी ओर इसमें नया प्रवेश लिया है एम.आई.एम. के प्रदीप कोरी ने। एमआईएम ने बिहार में विधान सभा चुनाव पिछले साल बिना किसी बड़ी जीत के लड़े थे। बीकापुर के उप चुनाव 2017 के उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनावों की तरफ पार्टी का पहला कदम होगा।

’मेरे पिता एक मजदूर थे। उनकी मौत 1997 में एक दुर्घटना में हुई। पिता की मौत के बाद मैं स्कूल के बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने लगा। ट्यूशन के पैसों से अपनी पढ़ाई, अपने भाई-बहन का खर्च और घर का खर्च जैसे-तैसे चलता था। मेरे पिता ने बैंक से लोन लिया था। लोन चुकाने के पैसे हमारे पास नहीं थे। मैं इंटर में पढ़ रहा था जब हमारे घर की कुड़की का आदेश आ गया। मदद मांगने मैं अपने सांसद के यहां पहुंचा।

मित्रसेन यादव उस समय सांसद थे। मदद की मेरी गुहार सुनकर उन्होंने कहा – ’क्या तुम्हारे पिता ने हमसे पूछकर लोन लिया था या हमसे पूछकर मर गए?’ मैं उनका जवाब सुनकर समझ गया कि राजनीति कितनी गन्दी हो गई है। उस दिन मैंने राजनीति में जाने के बारे में सोच लिया। मैंने 2009 में अपना संगठन बनाया – अखिल भारतीय युवा कोरी समाज। मैं गाँव-गाँव गया, मैंने रात में चिराग की रौशनी में मीटिंग की, कोरी समाज के लोगों को आगे बढ़ने के लिए कहा। अपना नाम लिखो, अपनी आवाज उठाओ – मैंने युवाओं और महिलाओं को आगे बढ़ने को कहा। मैं दिन में मोबाइल और कम्प्यूटर की छोटी सी दुकान चलाता और रात में अपने संगठन का काम करता। मेरा काम और जज््बा देखकर एम आई एम के जिला अध्यक्ष इंजीनियर इरफान ने मुझे पार्टी के उम्मीदवार के रूप में चुना।’

कोरी एमआईएम चीफ असद्दुदीन ओवैसी को पहली बार बीकापुर में उनकी पहली रैली के दिन 7 फरवरी को मिले थे। इन दोनों का मिलना 2017 में दलित-मुस्लिम वोटबैंक के एकीकरण की पूर्वसूचना होगा।
बीकापुर से उत्तर प्रदेश का भविष्य शुरू होता है – यह प्रदीप कोरी का मानना है। उनका अभियान उप-जाति के मुद्दों और बीकापुर के स्थानीय मुद्दों पर केंद्रित है। पार्टी का चुनावी एजेंडा भी कुछ अलग ही है – ग्रामीण इलाकों की जरूरतों को ध्यान में रखकर इसे प्रदीप कोरी पेश करते हैं – पहला एजेंडा है पंचायत स्तर पर फायर ब्रिगेड उपलब्ध हो ताकि जब गाँव में आग लगे तो सब कुछ ध्वस्त होने से पहले आग को काबू कर लिया जाए। दूसरा एजेंडा है ग्रामीण इलाकों में पोस्ट मोर्टेम की सुविधा दिलाई जाए ताकि लोगों को लाश को लम्बे समय तक रखकर दर्द न सहना पड़े। तीसरा एजेंडा है गाँवों में शिक्षा का स्तर बेहतर और मुफ्त बनाना जिससे गाँव के बच्चों को बेहतर पढ़ाई और जानकारी मिल सके। आखिर में सड़क दुर्घटनाओं को होने से रोकना और ‘ज़ीरो एक्सीडेंट प्रोग्राम’ भी एजेंडा है – यह ऐसे मुद्दे हैं जिन्हें किसी और पार्टी ने नहीं सोचा होगा।

कोरी के हिसाब से जहां अन्य पार्टियां उपचुनाव में खूब पैसा लगा रही हैं, वहीं सबसे कम खर्च में उनके जैसा चुनावी प्रचार किसी और का नहीं है जिसमें लोग अपनी खुशी से जुड़ रहे हैं। कोई तेल दे रहा है तो कोई गाड़ी दे रहा है, कोई कुछ और दे रहा है।
गाँव में कोरी बस्ती में प्रदीप कोरी को लोगों का पूरा समर्थन है। अपनी बिरादरी को वोट देंगे, किसी और को नहीं – यह बात कई लोगों ने कही। उपचुनाव में दलितों की पार्टी मानी जाने वाली बहुजन समाज पार्टी का न होना भी प्रदीप कोरी के लिए फायदेमंद हो सकता है। कोरी के मुताबिक अनुसूचित जाति और मुसलमान समुदाय को सांविधानिक पद में आना जरूरी है। उनका चुनावी पोस्टर भी इसकी तरफ इशारा करता है –
बाबा तेरा मिशन अधूरा
ओवैसी साहब करेंगे पूरा
क्या यह चुनाव एम आई एम के लिए दलितों और मुसलामानों के वोट को साथ लाने का एक प्रयोग ही रह जाएगा या उत्तर प्रदेश में एक नई चुनावी राजनीति का ऐलान करेगा – यह जल्द ही पता लग जाएगा।