जब महिलाएं ही खिलाफ हैं तो क्यों हो रहा है ‘तीन तलाक’ का बचाव?

साभार:गूगल
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मुस्लिम पर्सनल लॉ में पुरुषों को यह सुविधा दी गई है कि वे तीन बार ‘तलाक’ बोलकर अपनी पत्नी से रिश्ते खत्म कर सकते हैं। लेकिन इस कानून में महिलाओं को यह सुविधा नहीं है।
मुस्लिम पर्सनल लॉ के मुताबिक, अगर महिला अपने पति से अलग होना चाहती है, तो उसे ‘दारुल क़ज़ा’ (शरियत कोर्ट) के सामने यह साबित करना होगा कि उसके पति ने उस पर अत्याचार किए हैं, जिसकी वजह से वह तलाक चाहती है।
जाहिर तौर पर तलाक की यह व्यवस्था महिलाओं के अधिकारों को कमतर मानती है। ऐसे में महिलाओं के साथ हुए कुछ अनुचित और अन्यायपूर्ण फैसले सुर्खियां बनते रहे और सवालों के घेरे में भी आए।
5 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से इस मामले में 4 हफ्ते के भीतर अपनी टिप्पणी देने को कहा है। हालांकि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने क्रेंद सरकार की दखल को सिरे से ख़ारिज कर कहा है कि धार्मिक मामलों में कोर्ट को हस्तक्षेप करने की जरूरत नहीं है।

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इसके बाद मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों के लिए आवाज उठा रहे भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन के कार्यकर्ता ने इस बात को आड़े हाथ लिया है। कार्यकर्ताओं का कहना है कि जो कानून महिलाओं को पुरुषों के बराबर मानने को तैयार नहीं है, वह सही हो ही नहीं सकता।
कार्यकर्ता ने 4,710 महिलाओं पर सर्वे किया गया, जिनमें 525 तलाकशुदा थीं। इनमें 346 को जुबानी तलाक दिया गया था, 40 को पत्र भेजकर, 18 को फोन पर और 117 को किसी अन्य माध्यम से।
भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन के कार्यकर्ता का मानना है कि तीन तलाक अमानवीय है। यह संविधान के खिलाफ है। 15 साल से देश के करीब 10 राज्यों में हम काम कर रहे हैं। सभी जगह हमने देखा कि महिलाओं को इंसाफ नहीं मिला बल्कि उन महिलाओं की शिकायतों की कोई सुनवाई नहीं हुई। नवंबर, 2015 में हमने रिपोर्ट जारी की थी, जिसमें तमाम मामले ऐसे हैं जिनमें महिलाओं को रातोंरात घर से निकाला गया और बच्चों संग उनकी मां को बेसहारा छोड़ दिया गया, वो भी तीन तलाक का हवाला देकर। कई मामले तो ऐसी भी थे, जिनमें महिला की गैर-मौजूदगी में पुरुष ने तलाक दिया और काज़ी ने उसे सही भी ठहराया।
कोर्ट में अपने अधिकारों की मांग रखना, निंदा करना नहीं हो सकता। तीन तलाक के मामले में चुप रहना, धर्म के नाम पर पितृसत्ता और पुरुष बल को जीत का अवसर देना है। तीन तलाक का धर्म से कोई वास्ता नहीं है। संवैधानिक और लोकतांत्रिक तरीके से बात करें, तो तीन तलाक साफ तौर पर महिलाओं के अधिकारों का हनन करता है। यह पुरुषों को आजादी देकर, महिलाओं का शोषण करने का तरीका है। कुरान और धर्म के नाम पर इसे चलाया जा रहा है।
कुछ कट्टरपंथी मुसलमान इन हालात को नहीं बदलने देना चाहते, जबकि पवित्र पुस्तक कुरान का इससे कोई लेना देना नहीं। जब ज्यादातर मुस्लिम बहुल देशों में तीन तलाक को अवैध करार दिया जा चुका है। साथ ही भारतीय मुस्लिम महिलाएं, जो इस कानून से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं, उनका एक बड़ा तबका इसका विरोध कर रहा है, तो इस मुद्दे पर बहस की गुंजाइश कहां रह जाती है।