जन कवि बाबा नागार्जुन

Nagarzun1

जनता मुझसे पूछ रही है क्या बतलाऊं
जन कवि हूँ मैं साफ कहूँगा क्यों हकलाऊं|

जन कवि बाबा नागार्जुन की ये पंक्तियां उनके जीवन दर्शन, व्यक्तित्व एवं साहित्य का दर्पण है। अपने समय की हर महत्वपूर्ण घ्टना पर तेज तर्रार कवितायें लिखने वाले क्रान्तिकारी कवि बाबा नागार्जुन एक ऐसी हरफनमौला शख्सियत थे जिन्होंने साहित्य की अनेक विधाओं और तथा कई भाषाओं में लेखन कर्म के साथ-साथ जनान्दोलनों में भी बढ चढ़कर भाग लिया और उनका नेतृत्व भी किया

बाबा के नाम से प्रसिद्ध कवि नागार्जुन का जन्म 30 जून 1911 को बिहार में हुआ था। बाबा का मूल नाम वैद्यनाथ मिश्र था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा स्थानीय संस्कृत पाठशाला में हुई। बाद में वाराणसी और कोलकाता में आगे की पढ़ाई की। 1930 में जब वह बौद्ध धर्म की दीक्षा लेकर वापिस स्वदेश लौटे तो उनके जाति भाई ब्राहमणों ने उनका सामाजिक बहिष्कार कर दिया। बौद्ध धर्म ग्रहण कर सन्यासी बनने पर ससुराल वालों ने इनके पिता को कसूरवार ठहराया और हिदायत दी कि दामाद को वापस बुलायें नहीं तो जेल भिजवा देंगें। बाबा नागार्जुन ने ऐसी बातों की कभी परवाह नहीं की। राहुल सांस्कृतायन के बाद हिन्दी के सबसे बडे घुम्मकड साहित्यकार होने का गौरव भी बाबा नागार्जुन को ही प्राप्त है। पर अपनी माटी से लगाव के कारण वे बार-बार घर वापिस लौट आते थे।

1939 में वे स्वामी सहजानन्द सरस्वती और सुभाषचन्द्र बोस के सम्पर्क में आने के बाद उन्होंने छपरा में उमवारी के किसानों के साथ मिल संघर्ष का नेतृत्व किया। छपरा और हजारीबाग जेल में कारावास भोगने के तुरन्त बाद वे हिमालय तथा तिब्बत के जंगली इलाकों में भ्रमण के लिये निकल गये। 1941 में दूसरे किसान सभाई नेताओं के साथ भागलपुर केन्द्रीय कारागार में बन्द रहे। इसी दौरान वे गृहस्थाश्रम में वापिस लौट आये। 1948 में गांधीजी की हत्या पर लिखी गयी उनकी कविताओं के कारण उन्हें कारावास का दण्ड मिला।

परंपरागत प्राचीन पद्धति से संस्कृत की शिक्षा प्राप्त करने वाले बाबा नागार्जुन हिन्दी, मैथिली, संस्कृत तथा बांग्ला में कविताएँ लिखते थे। मैथिली भाषा में लिखे गए उनके काव्य संग्रह ‘पत्रहीन नग्न गाछ’ के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

स्वभाव से फक्कड और अक्खड़ बाबा नागार्जुन सच्चे अर्थों में जन कवि थे। वह बौद्ध भिक्षु भी रहे और कम्युनिस्ट प्रचारक भी, किसानों के आन्दोलन के साथ भी रहे और जयप्रकाश नारायण के छात्र आन्दोलन के साथ भी। वह प्रत्येक आन्दोलन और नेता के तभी तक समर्थक और अनुयायी रहे जब तक वह जनहित में रहा। जहां उन्हें लगा कि जनता को बरगलाया जा रहा है देश को धोख दिया जा रहा है वह तुरन्त पलटकर नेतृत्व पर टूट पड़े। इसका सबसे बडा उदाहरण है सन 1962 में चीनी आक्रमण के समय प्रतिबद्ध वामपंथी होते हुये भी उन्होंने कम्युनिस्ट नेताओं को उनकी चीनी भक्ति के लिये जमकर कोसा और स्वंय को धिक्कारने से भी नहीं हिचकिचाये।

जन संघर्ष में अडिग आस्था, जनता से गहरा लगाव और एक न्यायपूर्ण समाज का सपना, ये तीन गुण नागार्जुन के व्यक्तित्व में ही नहीं, उनके साहित्य में भी दिखते हैं। निराला के बाद नागार्जुन अकेले ऐसे कवि हैं, जिन्होंने इतने छंद, इतने ढंग, इतनी शैलियाँ और इतने काव्य रूपों का इस्तेमाल किया है। बाबा की कविताओं में कबीर से लेकर धूमिल तक की पूरी हिन्दी काव्य-परंपरा एक साथ जीती है। अपनी कलम से आधुनिक हिंदी काव्य को समृद्ध करने वाले नागार्जुन का 5 नवम्बर सन् 1998 को बिहार में निधन हो गया।