छोटे शहरों में ज़्यादा चुनौतियां

सुमन गुप्ता
सुमन गुप्ता

फैजा़बाद में जनमोर्चा अखबार से मैंने पत्रकारिता शुरू की। मैं पार्ट टाइम पत्रकारिता करना चाहती थी। लेकिन 1992 में अयोध्या दंगों को कवर करने के बाद मैंने तय कर लिया कि मैं पत्रकारिता ही करूंगी,पूरे समय के लिए। मेरी नज़र लगातार इस पर थी। 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद गिराई गई। पहले से ही मैं वहां मौजूद थी। मैं भीड़ के बीच में थी, तभी कुछ लोगों ने मुझ पर हमला किया।
मुझे लगता है कि बड़े शहरों के मुकाबले छोटे शहरों में पत्रकारिता ज़्यादा चुनौती भरी है, हालांकि पहचान भी जल्दी बनती है। लेकिन राष्ट्रीय मीडिया अक्सर छोटे शहरों के पत्रकारों को कुछ नहीं समझती। 2002-2003 में मुझे एक चिट्ठी मिली जिसमें लिखा था कि अगर मैं आगे काम करना चाहती हूं तो महीने का दो सौ से ढाई सौ रुपए मुझे मिलंेगे।

 

सुमन गुप्ता, जि़ला फैज़ाबाद, उत्तर प्रदेश