छह साल की उम्र से शुरु होता हैं, लिंग आधारित भेदभाव

साभार: विकिमेडिया कॉमन्स

लीन बैन द्वारा दी जर्नल साइंस के लिए एक प्रयोग किया, जो लिंग पर आधारित हैं, जिसके अनुसार 6 साल की उम्र से लिंगभेद का अन्तर लड़कियों को लड़कों की तुलना में कमजोर बना देता हैं। ये लिंगभेद जो इस बात को बल देता है कि लड़के लड़कियों से ज्यादा होशियार हैं। इस बात का असर 5 साल की उम्र में कम होता है।
बैन ने बच्चों में लिंग आधारित अन्तर को समझने के लिए 160 बच्चों पर एक परीक्षण किया, जिसमें उन्होंने दो खेल खेले। पहले खेल में अधिक चतुरता की जरुरत थी, जबकि दूसरा खेल वास्तव में कठिन था। बैन ने इस प्रयोग में पाया कि पांच साल तक के लड़के-लड़कियां ने इन खेलों में समान ध्यान दिया। पर पांच साल से ज्यादा के लड़के-लड़कियां पर ये प्रयोग किया गया, तो लड़कियों की रुचि चतुरता वाले खेल में कम दिखी।
बैन इस प्रयोग से आदमी और औरतों के शैक्षणिक विषयों में उनकी रुचि का पता लगाने की कोशिश करते हैं और वह देखते हैं कि ये अन्तर विचारों और बौद्धिक प्रतिभा की पुरानी सोच के कारण होता है।
ये पुरानी सोच की प्रतिभा और बुद्धिमता में पुरुषों का अधिपत्य हैं और अन्य तरह के लिंग आधारित भेदभाव के कारण महिलाओं के लिए विज्ञान जैसे विषयों को चुनना कठिन हो जाता है।
बैन का ये प्रयोग बच्चों के शुरुआती भेदभाव को बताने के लिए काफी है। एक अन्य प्रयोग में 240 पांच से सात साल के बच्चों पर किया। तो उन्होंने पाया कि पांच साल तक दोनों ही लिंगों में सीखने में कोई अन्तर नहीं है। पर इस उम्र से बढ़ते ही लड़कियां लड़कों की तुलना में धीमी गति से सीखने लग जाती हैं। ये अन्तर उनके करियर के चुनाव में भी दिख जाता है, ली बैन और उनकी टीम बताती हैं कि महिलाएं विश्वास की कमी के कारण पुरुषों की तरह भौतिक, गणित और दर्शनशास्त्र का भी चुनाव नहीं करती हैं।
आपको जानकार हैरानी होगी कि महिला-पुरुष के अन्तर को बनाने में माता-पिता, टीवी के विज्ञापन, फिल्म और टीवी के धारावाहिक भी हैं, जिन्हें देखकर ये बाते और गहरी हो जाती हैं और लिंग का अन्तर 6 साल की उम्र से ही दिखने लगता है।

साभार: द लेडीज़ फ़िंगर