चर्चाएं, नई नज़र से – दोपहर के कई मतलब

पूर्वा भारद्वाज
पूर्वा भारद्वाज

पूर्वा भारद्वाज लंबे समय से जेंडर, शिक्षा, भाषा आदि मुद्दों पर काम कर रही हैं। साहित्य में उनकी खास रुचि है। इन दिनों वे दिल्ली में रह रही हैं।

आठ नवंबर की सुबह थी। बिहार विधानसभा के चुनाव का नतीजा आनेवाला था। शुरुआत में भाजपा की बढ़त दिख रही थी और हम लोगों का दिल बैठ रहा था। लखनऊ से एक पत्रकार मित्र का सन्देश आया कि दोपहर तक इंतज़ार कीजिए। सुबह के रुझान से अलग दिखेगा नतीजा। बस फिर क्या था! उम्मीद की लौ को सहेजते हुए हम लोग दोपहर होने का इंतज़ार करने लगे। सचमुच दोपहर खुशी की आहट लेकर आई और उसकी गर्माहट बढ़ती गई।
वैसे दोपहर एक सी नहीं होती है। हर दोपहर अलग होती है – भाव में, रंग-रूप में भी। कोई दोपहर चटकीली धूपवाली तो कोई सीली हुई और ऊब से भरी होती है। कोई दोपहर खामोश होती है तो कोई गुलज़ार। मुझे याद है जब पापा हम दोनों भाई-बहन को गर्मी की दोपहर में दबोचकर सुला देते थे। भैया पापा की आंख झपकते ही रफूचक्कर हो जाता था। उसकी दोपहर गोली (कंचे), गिल्ली-डंडा खेलते हुए बीती। रह गई मैं! दोपहर का अकेलापन और खालीपन महसूस करते हुए।
बड़े होते जाने के साथ मैं दोपहर के समय का सदुपयोग करना सीख गई। मुझे ऐसी अनगिनत दोपहर याद हंै जब मैं पटना कॉलेज से सड़क पार करके अपने अड्डे का चक्कर लगाया करती थी। वहां छात्र संगठन (।प्ैथ्) के साथियों का हर वक्त जमावड़ा रहता था। तब मां गुस्सा होती थीं कि खड़ी दोपहर में कहां-कहां घूमती रहती है लड़की। हंसी आती थी कि खड़ी दोपहर और बैठी दोपहर और सोई दोपहर क्या होता है। भरी दोपहर का मतलब भी तब समझ में नहीं आता था। अब जब हिंसा की खबरें देखती हूं तो मां की चिंता समझ में आती है। सुनसान होना दोपहर का एक गुण है और वह खतरनाक माना जाता है। थोड़ा रहस्यमय भी।
दोपहर दिन के बीचोबीच का समय है जब सूरज ठीक हमारे सर पर होता है। बीचोबीच का मतलब मझधार समझिए या यह कि आधा सफर कट गया। यह निर्भर करता है आपके मन के भाव पर।
दोपहर घरेलू चिल्ल-पों से राहत देती है इसका मतलब शान्ति, आराम और छुट्टी भी है। उसमें खाना, खेलना, पेंगे बढ़ाना, फरियाना, अलसाना सब कुछ होता है लेकिन मैं सोच रही हूं कि यह किसको और कब नसीब होता है?
कठिनाई से दोपहर का रिश्ता सीधा है। जीवन की दोपहर को देखें। यह परीक्षा की घड़ी बन जाती है। छांह हो या न हो इस दोपहर से पार पाना होता है। दोपहर एक मापदंड बन जाता है। यदि स्कूल में दोपहर तक बच्चे टिक गए, दफ्तर में साहब और बाबू लोग टिक गए तो मानिए कि सबकुछ बढि़या चल रहा है। ऐसी ही उम्मीद बिहार में लालू-नीतीश से है, कम से कम दिन चढ़ने तक तो वे टिकें!