चर्चाएं, नई नज़र से – जो जितना बड़ा, उसे लगना उतना भयानक!

purva Bharduajपूर्वा भारद्वाज लंबे समय से जेंडर, शिक्षा, भाषा आदि मुद्दों पर काम कर रही हैं। साहित्य में उनकी खास रुचि है। इन दिनों वे दिल्ली में रह रही हैं।

मुझे भूख बहुत लगती है। अपने डायबटीज़ के मत्थे इसे डालकर मैं खाने का जुगाड़ करने में भिड़ जाती हूं। कभी-कभी लगता है कि सचमुच भूख नहीं है, केवल लगना है यह। कमाल की चीज़ है लगना! कुछ हो न हो बस लगता है। जैसे रात के अंधेरे में आंगन में फैली उजली चादर उड़कर तिरछी टंगी हो तो भुतहा लगती है। हम सब दूसरों को समझाते हैं कि देखो वह है नहीं, सिर्फ तुम्हें लगता है। माने सच्चाई से थोड़ी दूर की चीज़ है लगना।
लेकिन ज़रूरी नहीं। कई बार जो चीज़ होती है वह भी लगती है। बाबरी मस्जिद ढाह दिए जाने के बाद मुसलमानों को जो लगता है वह क्या है? औरतों को घर हो या बाहर जो लगता है कि वे सुरक्षित नहीं हैं वह क्या है? बुंदेली या बज्जिका भाषा बोलनेवालों को अंग्रेज़ीवालों के सामने जो लगता है वह क्या है? क्या सब लगना झूठ है?
लगना महसूस करना है। दोस्त ही नहीं, दुश्मन के लिए भी लगता है। इस लगने पर कोई बंधन नहीं है। मानिए तो इंसान होने की पहचान है लगना। यदि किसी को कुछ नहीं लगता है तो अचरज की बात होती है। उसमें एहसास ही नहीं है।
मगर जिसे हर बात लग जाए। यानी लगने का एक अर्थ है खटकना, अखरना। एक बार बात लग गई तो लग गई! इसलिए सावधानी बरतिए। यदि आपकी बात जाति-धर्म में बड़े, ओहदे में बड़े समझे जाने वाले को लगी है, चुभी है तो खैर नहीं! जान गंवाने से लेकर थूका हुआ चटवाने की सज़ा मिल सकती है। उसमें हिंसा छिपी है। जो जितना बड़ा, उसका लगना उतना भयानक! आजकल हिन्दुओं को दूसरों का खान-पान भी लग रहा है!
लगना का अर्थ सटना, चिपकना भी है। आज तक मां-पापा से लगकर सोने का सुख याद करती हूं। यह लाड़-प्यार जताने का तरीका है। मुंहलगा इसी से बना है और दिल्लगी की जड़ में भी यही है। इसीलिए जवान लड़की लड़कों से लगकर बैठे तो लोगों की भौं टेढ़ी होने लगती है। किसी दिन खाप पंचायत इसे मुद्दा बना लेगी, नहीं तो कहीं से फतवा आ जाएगा।
लगे रहो मुन्ना भाई याद है न? लगना जुट जाना है। इसलिए अटकिए नहीं, भटकिए नहीं, लगिए और बस लगे रहिए। फिर भी ध्यान लगना और मन लगना कितना भारी काम है!