चर्चाएं, नई नज़र से – कई तालों को खोलती चाभी

पूर्वा भारद्वाज
पूर्वा भारद्वाज

पूर्वा भारद्वाज लंबे समय से जेंडर, शिक्षा, भाषा आदि मुद्दों पर काम कर रही हैं। साहित्य में उनकी खास रुचि है। इन दिनों वे दिल्ली में रह रही हैं।

कल कई जगह होते हुए एक दोस्त के घर पहुंची। वहां स्वागत किया ताले ने। फोन घुमाने भर की देर थी। दोस्त ने बताया कि पड़ोसी के पास चाभी है। सोचने लगी कि दिल्ली जैसे बड़े शहर में अभी भी चाभी का लेन-देन चलता है। यह आखिर भरोसा ही है न! हम उसी को चाभी देते हैं जिस पर भरोसा करते हैं। आज इस पर ध्यान जाने की एक वजह और थी। उस दोस्त ने शादी मुसलमान से की है और उसके पड़ोसी को चाभी रखते समय दोनों मियां-बीवी के धर्म में अंतर होने से फर्क नहीं पड़ता है। अभी के समय में यह साधारण सी बात भी राहत देती है!

चाभी बहुत ज़रूरी चीज़ है। किसी चीज़ को सुरक्षित रखना है तो हम उसे ताले-चाभी में बंद कर देते हैं। फिर चाभी संभालते फिरते हैं। घर की चाभी है या दफ्तर की या गाड़ी की या बैंक के लॉकर की चाभी, इसके हिसाब से यह तय होता है कि जि़म्मेदारी किसकी है। औरतों के पास किस-किस चीज़ की चाभी रहती है, इसे पलटकर देखना चाहिए।

हम कभी यह नहीं सोचते हैं कि चाभी दरअसल नियंत्रण का मामला है। चाभी किसके पास रहेगी या किसको दी जाएगी, यह मायने रखता है। मुझे याद है जब मां मुझको भंडार की चाभी देकर बाहर जाने लगी थी तब मुझको कितना अच्छा लगता था। जब टीवी के धारावाहिकों में चाभी को लेकर होने वाली लड़ाई देखती हूं तब हंसी आती है, मगर मामला तो चाभी के बहाने सत्ता हथियाने का है।

वैसे चाभी देना मुहावरा भी है। बच्चों को कनैठी देने को सबलोग चाभी देना कहते हैं। बड़ों-बड़ों को चाभी दी जाती है। तब यह सज़ा भी है और इशारे पर नचाना भी। जैसे कठपुतली सरकार हो, उसे जब जितनी चाभी भरी जाती है वह वैसे ही काम करती है।
चाभी खोना तो बवाल मचा देता है। गुल्लक तक की चाभी खोना खज़ाना लुटने जैसा महसूस होता है। ‘हम तुम एक कमरे में बंद हों और चाभी खो जाए’ गाना याद कीजिए। किशोर-किशोरी यह गाना गुनगुनाएं भी तो सब डर जाते हैं।

दरअसल चाभी का अर्थ सिर्फ लोहे-पीतल से बनी कुंजी नहीं है। यह कुछ पाने का रास्ता है। फिलहाल हमें अमन-चैन से साथ रहने की कुंजी चाहिए। और कुछ नहीं।