चकबंदी से हकबंदी का रोवत किसान

बांदा चकबंदी विभाग लगभग दस साल पहिले गांवन-गांवन खेतन के चकबंदी कराइस रहैं कि किसान के हेंया होंआ बिथरान खेती एकै जघा मिल जई। जबैकि यहिसे किसानन का फायदा बहुतै कम नुकसान ज्यादा भा है। फायदा नुकसान के बारे मा विभाग काहे नहीं सोचिस आय?
अगर नुकसान के बात कीन जाय तौ बहुतै किसान के उपजाऊ खेती चली गे है। बदले मा बंजर खेती मिली है। अगर वहिके पास यतनी ही खेती है तौ वा कसत आपन घर खर्च चलावैं? दूसर नुकसान या कि बहुतै किसानन का अमीर किसान के खेती मिली है तौ वा आज भी कब्जा खातिर परेशान हंै। थोई नेता नगरी अउर अधिकारी के सम्पर्क मा रहैं वाले किसान तौ दोहरा फायदा पाये हैं। अगर उनका कउनौ गरीब किसान के खेती मा चक मिला है तौ वा आसानी से हक पाये है अउर दूसर कइत अगर वहिके जमीन मा गरीब किसान का कब्जा मिला है तौ वा कतौ आपन खेती मा गरीब किसान का कब्जा न देई। तीसर नुकसान या भी भा है कि चकबंदी कर्मचारिन का रूपिया दइके उपजाऊ खेती अमीर अउर बंजर खेती गरीब किसान का दीन गे है। यतना नुकसान सहैं के बाद भी ज्यादातर किसान कब्जा पावैं खातिर दस साल से परेशान हैं। विभाग किसानन के या समस्या से अनजान निहाय, पै या मामला मा चुप्पी काहे साधे है?
बहुतै किसान कब्जा पावैं खातिर हकबंदी का मुकदमा लड़त हंै। अब या मुकदमा चलैं से दोहरा नुकसान का सामना भी किसान ही करत है। खेती तौ चली ही गे है ऊपर से घर से रूपिया फुंकत है। साथै समय अउर मेहनत के कउनौ गिनती ही निहाय। का विभाग या समस्या का यहिनतान देखत रही या फेर कुछ कारवाही भी करी?