घर बचाने की मुहिम

साभार: फ्लिकर

2014 में भारतीय जनता पार्टी की भारी जीत के बाद पार्टी का विजय रथ आगे ही बढ़ता जा रहा था। मोदी लहर के कारण मिले भारी बहुमत ने अन्य पाटियों के भविष्य में प्रश्नचिन्ह लगा दिया था। जिस कारण से विपक्ष को एक साथ आना जरुरत और मजबूरी दोनों थी। इस ही कारण से बिहार में धुर विरोधी लालू प्रसाद और नीतीश यादव को साथ आना पड़ा । लेकिन ये बात अलग है कि आज नीतीश फिर से राजद का हिस्सा हो गए हैं। वहीं कर्नाटक चुनाव में बहुमत से चूकी भाजपा के हाथ से मौका छिनने के लिए कांग्रेस ने जनता दल यूनाइटेड के साथ गठबंध में सरकार बना ली।

विपक्ष का एक साथ आना भाजपा के लिए खतरे की घंटी है, क्योंकि नूरपुर, गोरखपुर और फिर कैराना में हुए उपचुनावों के नतीजे विपक्ष की एकता का परिणाम है। कैराना में राष्ट्रीय लोक दल की विजय उम्मीदवार तबस्सुम को सपा, बसपा, आम आदमी पार्टी और कांग्रेस ने समर्थन दिया था। विपक्ष की एकता से बुरे परिणामों को रोकने के लिए ही भाजपा राजद परिवार के अन्य दलों के साथ खराब हुए रिश्तों को सही करने के लिए निकल गई है। भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह इस ही मुहिम को आगे बढ़ाने के लिए शिवसेना के अध्यक्ष उद्धव ठाकरे से मिले। यह बात अलग हैं कि उद्धव ठाकरे ने लोकसभा का चुनाव अकेले लड़ने की घोषण कर दी है। वहीं पंजाब में शिरोमणि अकाली दल के मुख्य प्रकाश सिंह बादल और सुखबीर बादल से 6 जून को मिले।

समर्थन फॉर सपोर्ट मुहिम के तहत शाह की अगली तैयारी बिहार है, पर उनके पटना पहुंचने से पहले ही राजग की बैठक में राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के उपेंद्र कुशवाह ने हिस्सा नहीं लिया। जो बताता हैं कि राजग की एकता आसान काम नहीं है.  हालांकि शाह अपने समर्थन फॉर सपोर्ट की मुहिम को कितना सफल बना पाएगे ये तो समय बताएगा पर अभी तक के राजनीति माहौल को देखकर ऐसा लग रहा हैं कि भाजपा को लोकसभा चुनाव में मोदी लहर से काम चलता नहीं लग रहा है। जिस कारण से वह परिवार बचाने की मुहिम में निकल पड़ी है।  

– अल्का मनराल