गणतन्त्र दिवस मुबारक!

संविधान और गणतन्त्र
जनवरी की ठंड देश भक्त के जज्बे को बढ़ा देती है। बाजार तिरंगों से सजा, दफ्तर और विद्यालयों में देशभक्ति के गानों के साथ लहराते  तिरंगे  26 जनवरी के जश्न को चार-चांद लगा देते हैं। रौनक हो भी क्यों नहीं गणतन्त्र दिवस यानि गण (जनता) का तन्त्र (प्रणाली) है। 69वें गणतन्त्र दिवस पर हम जानें कितना सक्षम हुआ हमारा गणतन्त्र।
26 जनवरी 1950 से विश्व का सबसे बड़ा कानून भारतीय संविधान लागू हुआ। हमारा संविधान बड़ा होने के साथ सबसे लम्बा लिखित संविधान भी है। संविधान में 465 धाराएं, 12 अनुसूनियां, 5 अनुलग्नक के साथ 101 संशोधन है। 15 अगस्ता 1947 को ब्रिटिश राज के खत्म होने के साथ ही देश में कानून व्यवस्था बनाने के लिए संविधान की जरुरत हुई। इस जरुरत के लिए देश में संविधान मसौदा समिति का गठन किया गया, इस समिति के अध्यक्ष डा. भीमराव अंबेडकर बने। डा. भीमराव अंबेडकर की अध्यक्षता में देश को संविधान मिला और देश में लोकतांत्रिक सरकार प्रणाली लागू हुई।

बाबा साहब अंबेडकर का संविधान और देश
आज पार्कों और सड़कों के किनारे बाबा साहब के बूत उनके संविधान निर्माण के योगदान की कीमत चुका रहे हैं। पर शायद उनकी आत्मा संविधान  के अनुच्छेद 17 में लिखे छुआछुत और जातिवाद को खत्म करके की बात को आज भी न होता देखकर दुखी होती होगी। बाबा साहब ने अपने जीवन में ये भेदभाव देखा था, जिसे खत्म करने का पूरा प्रयास उन्होंने संविधान में किया। लेकिन जातिवाद की जड़े बहुत मजबूत हैं।

बुंदेलखंड में जातिवाद की जड़े
बुंदेलखंड में जातिवाद कितना गहरा है, ये आपकों कुछ घटनाओं से पता चल जाएगा। महोबा जिले के सिरमोन गांव में दलित बस्ती को हैन्डपम्प से पानी इसलिए नहीं भरने दिया जाता क्योंकि उनके छूनें से पानी अपनी शुद्धता खो देगा। यहां के निवासी किशोरीलाल का कहना है कि हमारी बस्ती का हैन्डपम्प बिगड़ा है। दूसरी बस्ती के लोग छुआछुत के कारण हमें पानी नहीं भरनें देते हैं।
ऐसी ही कहानी महोबा के नहदौरा गांव में हुई। दलित बस्ती का हैण्डपम्प खराब होने की स्थिति में उन्हें पानी के लिए तरसना पड़ा। वहीं सरकार की मिड डे मील योजना के तहत ललितपुर मड़ावरा गांव के प्राथामिक विद्यालय में एक रसोइया के हाथों का खान इसलिए नहीं खाते क्योंकि वे दलित जाति से है।
ललितपुर जिले के जनौरा गांव में जातिवाद इसतरह था कि गांव में अहिरवार जाति के लोग चप्पल उतारकर चलते थे। अहिरवार जाति की नीलम कहती हैं कि पूरे गांव में चप्पल उतारकर चलना पड़ता है। चप्पल पहनकर चलनें से लड़ाई होती है, गांव के लोग गाली देते हैं, तो डर लगता है इसलिए हम चप्पल पहनकर नहीं निकलते हैं। हालांकि खबर लहरिया में ये खबर छापने के बाद ये गलत प्रथा खत्म हो गई।

ललितपुर जिले में जातिवाद प्रथा बरकरार और वहीं अधिकारी जुमला राजनीति में व्यस्त
उषा को रसोइये पद पर नियुक्त किया, लेकिन इनके हाथ से बने खाने पर छुआछूत हावी
महोबा जिले में आज भी छुआछूत का तांडव, बड़ी जाति के लोग दलित को नहीं भरने दे रहे हैं पानी
जिनके साथ होता है छुआछूत वो करने लगे हैं छुआछूत, महोबा जिले के सिरमोन गांव में


ये कुछ उदाहरण थे, जो इस संविधान निर्माता यानि बाबा साहब के संविधान के लागू होने वाले दिन सोचने के लिए जरुर बनते हैं, क्या हम भी समानता पर विश्वास करते हैं और बड़े- छोटे का भेद पैदा करने वाली इस जातिवाद को कितना मानते हैं, कहीं ऐसा तो नहीं की जातिवाद की कोई जड़ आपके दिमाग में पेड़ बनने को हो। तो इस बार गणतंत्र दिवस में इस जातिवाद की जड़ को उखाड़ फैके।

69वें गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएं !

-अल्का मनराल