खेल सी जिन्दगी …

 

Nirantar1

 

 

 

 

 

न जाने मैं कब इतनी बड़ी हो गयी,
खेल-कूद, दौड़-भाग को भूल,
जीवन के पतंग की लरी हो गयी।

कामकाज को, चाल-ढाल को,
सीख-सीख कर मैं बड़ी हो गयी।

अनमनी बेरुखी सी , गुमसुम मुरझाई सी,
किसी पिंजडे की चिड़िया सी ,
मैं ऐसे ही बड़ी हो गयी।

मैं कागज की गुड़िया सी, हाथों की कठपुतली सी,
किसी की इज्जत, किसी का मान हो गयी।

अपने से दूर, अपने मन से दूर,
न जाने कब परायी हो गयी।

चहकना भूल गयी, उड़ना भूल गयी ,
पिंजड़े में बैठी, मैना के जैसी,
आसमान से क्यों लड़ाई हो गयी ?

आज, खेल का नाम सुनकर,
बचपन के समंदर में, गोटा लगाया,
मन को बहकाया, दौड़ाया-भगाया,
फिर से आज खेल में सबको हराया,
कितनो को गिराया, कितनो को हंसाया।

चीखी-चिल्लाई, ठहाके लगाई।
ये कौन थी आज बिलकुल समझ न पाई।

– प्रार्थना