क्रेशर मशीन में काम न करें तो चूल्हा कैसे जले

kkचित्रकूट जिला।यह  एक पिछड़ा इलाका है। इस जिले में पांच ब्लाक हैं। इनमें से कर्वी ब्लाक का कस्बा भरतकूप है। इस कस्बे में ज्यादातर क्रेशर मशीनें  हैं जिनमें कि पहाड़ के पत्थर से गिट्टी बनाने का काम किया जाता है। इसी क्रेशर मशीनों में लगभग पचास गांव के लोग मजदूरी करके अपना जीवन चलाते हैं। क्योंकि जीवन यापन करने के लिये और कोई दूसरा जरिया नहीं है।
क्रेशन यूनियन अध्यक्ष ध्यान सिंह का कहना है कि भरतकूप में लगभग पचास क्रेशर मशीन हैं। इन क्रेशर मशीनों में ज्यादातर कोल जाति की महिलायें काम करती है क्योंकि इनके पति काम धंधा नहीं करते हैं। ऊपर से शराब पीते हैं। एक दिन में क्रेशर मशीन में काम करने वाला आदमी ढाई सौ रूपये कमा लेता है। अगर इस काम के दौरान किसी की मौत हो जाती है तो तेरही के लिये रूपये और परिवार वालों को मुआवजा दिया जाता है। चोट लगती है तो इलाज कराया जाता है। परिवार वालों को खाना खर्चा दिया जाता है। इसके बाद भी अगर कोई मुकदमा लगता है और ज्यादा रूपये की मांग करता है तो समझौता करके उसकी मांग पूरी की जाती है।
क्रेशर मशीन में काम करने वाले सिकन्दर ने बताया कि दो साल से ट्रक में गिट्टी भरने का काम करता हूं। दिन भर पांच सौ रूपये कमा लेता हूं। क्योंकि इस काम के अलावा दूसरा कोई काम नहीं है। अगर यह काम न करें तो हमारे घर में चूल्हा तक नहीं जल सकता है। कुछ इसी तरह रामचन्द का कहना है कि पढ़े लिखे नहीं हैं। मनरेगा के तहत काम करने में एक दिन में एक सौ बीस रूपये मजदूरी मिलती है। इतनी मंहगाई है कि इतने में परिवार का खर्च अच्छी तरह से नहीं पूरा होगा। इस मजबूरी से क्रेशर में काम करते हैं जबकि क्रेशर मशीन में काम करने से टी.बी. की बीमारी होने की शंका रहती है।
दशोदा ने भी यही कहा कि गरीब और कोल जाति की लड़की हूं। दो ट्रक गिट्टी भरने में तीन सौ रूपये मिलता है। मेहनत बहुत करनी पड़ती है। क्योंकि कोल जाति के लोग चित्रकूट जिले में बहुत ही गरीब हैं।
ए.डी.एम. केशवदास का कहना है-क्रेशर मशीन में मौत होने या कोई दुर्घटना से घायल आदमी को मुआवजा और इलाज कराते हैं। अगर कोई व्यक्ति किसान है तो कृषि विभाग के तहत दुर्घटना होने में पांच लाख रूपये दिया जाता है। यह रूपये सरकार देती है। और पति की मृत्यु होने पर परिवारिक लाभ के तहत बीस हजार रूपये मिलते हंै।