क्या दलितों के शक्ति प्रदर्शन से डर गयीं आनंदीबेन?

Anandi_Ben

गुजरात की मुख्यमंत्री आनंदीबेन ने 1 अगस्त को फ़ेसबुक पर अपने इस्तीफे की घोषणा की। भाजपा  का  कहना है कि उन्होंने इसलिए पद छोड़ना चाहा क्योंकि वह नवम्बर में 75 साल की हो जाएँगी और तब उन्हें पद त्यागना ही होगा।

गुजरात की राजनीति पर नज़र रखने वाले मानते हैं कि इस्तीफ़े का असल कारण ये था कि गुजरात में भाजपा की पकड़ हर रोज़ कमज़ोर हो रही थी। उनके इस फ़ैसले से गुजरात में किसी को आश्चर्य नहीं हुआ। भाजपा समेत गुजरात में एक बड़ा समूह मानता था कि गुजरात भाजपा को बचाने के लिए नेतृत्व परिवर्तन के सिवा और कोई चारा नहीं है।

सूत्रों का यह भी कहना है कि गुजरात में आनंदीबेन पटेल ने जबसे मुख्यमंत्री का पद संभाला तभी से पार्टी के बहुत कम नेता उनके साथ थे और आनंदीबेन पटेल को दो साल के कार्यकाल में एक साथ कई मोर्चों पर अकेला ही लड़ना पड़ा। आनंदीबेन पटेल पर पार्टी के सीनियर नेता ये भी आरोप लगाते थे कि वो पार्टी नेताओं के साथ विचार विर्मश नहीं करती हैं और सभी फ़ैसले ख़ुद ही करती हैं।

इस बीच उनके ऊपर कई आरोप भी लगाए गये। सबसे पहले उन पर अपनी बेटी अनार पटेल को वन विभाग की सरकारी ज़मीन सस्ते दामों में देने का आरोप लगा था। दूसरा आरक्षण को लेकर डेढ़ साल से पाटीदार आंदोलन चल रहा है। अभी यह आंदोलन ख़त्म भी नहीं हुआ था कि दलित आंदोलन शुरू हो गया है। जानकारों के अनुसार, राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह का गुट भी आनंदीबेन को हटाए जाने की मांग आला कमान से कर रहा था। स्पष्ट है कि कई सारे सवालों में घिरी आनंदीबेन और गुजरात बीजेपी का ग्राफ नीचे गिर रहा था।

गुजरात में पटेल और दलित आंदोलन को उन्होंने गंभीरता से लिया ही नहीं। उसी कारण से पार्टी को काफी नुकसान हुआ है। पार्टी के नेताओं की भी समझ में आ रहा है कि ऐसा ही चलता रहा तो 2017 के विधानसभा चुनाव में पार्टी को खामियाज़ा भुगतना पड़ सकता है।

भाजपा इस बात से सहमत नही है कि आनंदीबेन को पटेल और दलित आंदोलनों के चलते इस्तीफ़ा देने के लिए मजबूर किया गया है। बल्कि उनका कहना है कि नवंबर 2016 में आनंदीबेन पटेल 75 साल पूरे कर रही हैं और उसी कारण से उन्होंने इस्तीफ़ा दिया है।