क्या झारखंड में भूख से मरने वालों की मौत का कारण आधार कार्ड है?

राजेंद्र बिरहोर का नाम भी अब भुखमरी से मरने वालों की लम्बी लिस्ट में जुड़ गया हैI वे रामगढ़ के मंडू ब्लॉक के चैनपुर के निवासी थे और विशेष रूप से कमज़ोर जनजातिय समुदायों (पीवीटीजी) वर्ग से थेI  

बताया जा रहा है कि आधार कार्ड होने कि वजह से उन्हें सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) से बाहर कर दिया और उन्हें राशन कार्ड देने से माना कर दिया गया।

बहुत ज़्यादा बीमार और कमज़ोर होने के कारण बिरहोर ने पिछले साल काम करना बंद कर दिया था। वह अपने घर में कमाने वाले इकलौते व्यक्ति थे। उनकी बीमारी के बाद उनकी पत्नी हफ्ते में 2 से 3 दिन काम ढूँढने में कामियाब रहीं , जिससे परिवार के 6 बच्चों को पाला जा सकेI

मानवाधिकार कानून नेटवर्क की फ़ैक्ट फ़ाइंडिंग टीम ने यह खुलासा किया कि बिरहोर के परिवार को राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 के तहत राशन कार्ड नहीं मिला। 

ब्लॉक विकास अधिकारी (बीडीओ)की रिपोर्ट में भी यह बताया गया कि परिवार को पीडीएस प्रणाली से इसीलिए बाहर किया गया क्योंकि उनके पास आधार कार्ड नहीं था

सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के अनुसार विशेष रूप से कमज़ोर जनजातिय समुदायों (पीवीटीजी) के लोगों को हर महीने अन्त्योदय अन्न योजना राशन कार्ड  (एएवाईके अंतर्गत 35 किलो राशन पाने का हक़ है। 

एएवाई पीडीएस योजनाओं के अंतर्गत एक योजना है जिसे 2000 मे लागू किया गया था।  एएवाई  योजना का काम देश भर में सबसे गरीब लोगों को बहुत की कम कीमत पर राशन पहुँचाना है। इसी तरह विशेष रूप से कमज़ोर जनजातिय समुदायों (पीवीटीजी) के लोगों के घरों तक मुफ्त में राशन पहुँचाने का भी प्रावधान है।

फ़ैक्ट फ़ाइंडिंग रिपोर्ट में लिखा है कि, “इस परिवार ने नरेगा के अंतर्गत 2010-11 में काम किया था।

इन्हें  पीवीतीजी परिवारों को हर महीने मिलने वाली 600 रुपये की पेंशन भी नहीं मिलती। बीडीओ को भी इस स्कीम के बारे मे कोई जानकारी नहीं थी।’’ 

बीडीओ ने यह कहा था कि राशन पाने के लिए आधार कार्ड अनिवार्य है। फ़ैक्ट फाइंडिंग कमेटी की एक सामाजिक कार्यकर्ता अंकिता ने कहा कि इस परिवार ने आधार कार्ड बनवाने के लिए दो बार नामांकन भारा था लेकिन उन्हें आईडी नंबर नहीं मिला , जिससे उन्हें राशन नहीं दिया गया।

रिपोर्ट में बताया गया है कि बिरहोर बहुत ज़्यादा बीमार थे और इस वजह से उन्हें मंडू के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसीले जाया गया था।

फ़ैक्ट फ़ाइंडिंग टीम से मिले डॉक्टर यह बता सके कि ब्लड टेस्ट और यूरीन टेस्ट जैसी आसान जाँच भी क्यों नहीं करवाई गयीं। सीएचसी में उन्हें कोई भी दवाई नहीं बताई गयी।

राजेंद्र का इलाज करवाने के लिए परिवार ने एक सूअर बेच दिया और उनका इलाज एक  स्थानीय डॉक्टर द्वारा कराया गयाI इसी दौरान सीएचसी के डॉक्टरों ने वहाँ की स्थानीय आशामान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता पर इस मौत की ज़िम्मेदारी डाल दी है , उनका कहना है कि आशा ने उनकी सेहत का ध्यान नहीं रखा।

इससे पहले 14 जून को इसी इलाके केई चिंतामन मलहार की भी इसी तरह भूख से मौत हो गयी थी। फ़ैक्ट फ़ाइंडिंग टीम की जाँच के अनुसार इस परिवार के पास भी राशन कार्ड नहीं था।

रिपोर्ट के अनुसार, आधार कार्ड प्रणाली से जुड़ा होना इस मौतों का मुख्य कारण है। रिपोर्ट में कहा गया है कि आधार के कारगर होने कि वजह से कम से कम सात मौतें भुखमरी से हुई हैं।

सरकार ने इस बात पर बिलकुल ध्यान नहीं दिया है कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली में दाल और तेल भी दिया जाए और उसे आधार कार्ड से अलग किया जाए।

साभार: इंडियास्पेंड