क्या कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी कर पाएंगे पार्टी की नैया पार?

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132 साल पुरानी कांग्रेस पार्टी के नये अध्यक्ष राहुल गांधी बन गए है। उनका अध्यक्ष बनना तय ही था क्योंकि वे निर्विरोध थे। 20 साल तक कांग्रेस का नेतृत्व कर चुकी सोनिया गांधी के बाद राहुल ने ये जिम्मेदारी आखिरकार ले ही ली। देश की इस सबसे पुरानी पार्टी उतार-चढ़ाव के कई युगों से गुज़री है, लेकिन अभी तक के इतिहास में पार्टी के सबसे बुरे दिन वर्तमान में ही है, जब पार्टी अपने अस्तिव के लिए संघर्ष कर रही है। इतिहास गवाह है कि इंदिरा गांधी की 1977 के आम चुनाव की हार ने कांग्रेस को बुरी तरह तोड़ दिया था। वहीं सोनिया गांधी ने भी बुरे समय में कांग्रेस को संभाला था और देश को गठबंधन की सरकार दी।
अब देखना ये है कि राहुल कैसे पार्टी को आधार देते हैं। 2014 लोकसभा चुनावों में कांग्रेस का वोट प्रतिशत 20 से भी कम रहा और उसे 543 सीटों में से 44 सीटों में ही जीत मिली। इस समय पार्टी कर्नाटक और पंजाब जैसे राज्यों में ही है, जबकि उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे देश के बड़े राज्यों में पार्टी गंभीर रूप से हार चुकी है। ऐसे हालातों में क्या 47 साल के राहुल गांधी पार्टी का भविष्य बदल सकेंगे? ये सवाल सबके मन में है। राहुल ने 13 साल पहले अपने माता-पिता की तरह ही राजनीति में अनइच्छा से प्रवेश किया, और 2013 तक वे पार्टी के दूसरे बड़े नेता बन गए। उन्होंने पार्टी में पदाधिकारियों से लेकर टिकट देने तक में मुख्य भूमिका निभाई। युवा नेताओं को पार्टी में महत्वपूर्ण पद दिए। इसके बावजूद भी पार्टी की दिन ब दिन खराब होती स्थिति को वे पूरी तरह से संभाल नहीं पाये।
आज राहुल गांधी का सीधे सामना नरेन्द्र मोदी से है, जिसके चलते ही वह गुजरात चुनाव में उत्साह से भरे दिखे और उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को बराबरी की टक्कर दी। उन्होंने गुजरात में नरेन्द्र मोदी को रोजगार की कमी, नोटबंदी, असहिष्णुता और उनके अधूरे वादों पर घेरा। इसके बावजूद भी राहुल गांधी की एक चुनौती अपने वंश के नाम से संघर्ष करना है, क्योंकि नरेन्द्र मोदी जमीनी नेता हैं और इस बात का फायदा उन्हें होता भी है। राहुल खुद भी मानते हैं कि मोदी उनसे अच्छे वक्ता हैं।

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कांग्रेस पार्टी पर हमेशा परिवारवाद का आरोप लगता है, जबकि देखा जाए तो देश की सभी छोटी बड़ी पार्टियां में कुछ ही परिवारों का राज है। राहुल की गुजरात चुनावों में रणनीति से आगे की राजनीति रणनीति को समझ सकते हैं। गुजरात चुनाव में मंदिर में जाना, खुद को जनऊ धारक हिन्दु बताना जैसी बातें ये संकेत कर रही है कि वह हिन्दुत्व का विरोध करना चाहते हैं पर हिन्दुओं का नहीं। अपने पारंपरिक वोट बैंक को हासिल करने के साथ उनकी तैयारी भाजपा के वोट बैंक पर सेंध करने की भी है। इस समय राहुल उत्साह से भरे हैं, उन्होंने गुजरात चुनाव के दौरान पार्टी में एक जान फूंकी, लेकिन चुनाव जीतने के लिए उत्साह के साथ रणनीति की जरुरत होती है।
देखते हैं कि वे अपनी सफलता के चरम में पहुंची भाजपा की रणनीति को भेदते हुए, पार्टी के पुराने इतिहास को दुहराते हुए उसके अस्तिव को बचा पाते हैं, या फिर नहीं।

अल्का मनराल