क्या अंबेडकर को हमने सच में भुला दिया?

बाबा साहब भीमराव आंबेडकर इतिहास के पन्नों में दर्ज वो नाम हैं, जिन्होंने देश के कमजोर तबके की बात को पुरजोर तरीके से रखा अपने पूरे जीवन के दौरान, उन्होंने दलितों और पिछड़ों की लड़ाई लड़ी उन्हें भारतीय संविधान के पिता के रूप में भी जाना जाता है
लेकिन आज छुआछूत के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले आंबेडकर को समाज ने दरकिनार कर दिया है शहरों में और जिलों में उनकी मूर्तियाँ ऐसी जगह स्थापित की गयीं हैं जहां कोई नहीं जाता और ही किसी का दूर दूर तक रहनसहन है सिर्फ खानापूर्ति के लिए ही मूर्तियाँ लगा कर लोग भूल गये हैं
सोचने वाली बात यह है कि सरकार ने इन्हें अपना चुनावी मुद्दा बना लिया है और जनता ने मात्र एक खास दिन! हमारे समाज को आंबेडकर उनकी जयंती के दिन याद आते हैं और सरकार को चुनावों पर
बाँदा में बहुजन समाज पार्टी के जिला प्रभारी लालू प्रसाद निषाद का कहना है कि आज़ादी के बाद दलितों को उनका हक़ और अधिकार दिलाने के लिए आंबेडकर ने बहुत संघर्ष किया हम उन्हें इस लिए भी याद करते हैं कि उन्होंने संविधान बना कर सिर्फ सभी को बराबरी का दर्जा दिलाया बल्कि हर समाज के, हर व्यक्ति को अपने सम्मान के लिए बोलने और जीने के अधिकार दिलाये
बोद्धविहार बाँदा के संघमित्रा संचालक आर पी चौधरी का कहना है कि बाबा साहब ने अपने संघर्ष के चलते अपना पूरा जीवन और अपना परिवार देश के लिए कुर्बान कर दिया उन्होंने अपने संघर्ष को लक्ष्य मानते हुए उस पर अमल किया और कभी विचलित होते हुए हम दलितों को हक दिलाया आज लोगों ने भावनाओं में बह कर उनकी जगह जगह मूर्तियाँ तो लगवा दीं लेकिन उनका रखरखाव करना भूल गये
आंबेडकर की मूर्ति ही हमें यह शिक्षा देती है कि हमें निरंतर पढ़ते हुए आगे की ओर अग्रसर होते जाना है लेकिन अफ़सोस आज समाज उन्हें भूलता जा रहा है

रिपोर्टर- मीरा देवी
Published on Aug 11, 2017