कैसा होता है? सूखे के बीच ‘‘हरियाली’’ का होना

Chhatarpur downtoearth copyइस साल केंद्रीय बजट पेश करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किसानों की आय 2022 तक दोगुना करने का वादा किया है! लेकिन क्या लगातार सूखा, पानी की कमी और अकाल जैसी स्थिति का सामना करने वाले किसानों के लिए ऐसा सोच पाना मुमकिन होगा?
डाउन टू अर्थ ने इसके तथ्य खोजने के लिए कई गांवों का निरक्षण किया। इन गांवों में, भारत के सबसे सूखा प्रभावित क्षेत्र हैं जो मानसून न होने के कारण, पानी की कमी और अनाज न होने के कारण भुखमरी का शिकार हो रहे हैं। ऐसी ही एक बुंदेलखंड के सूखाग्रस्त गांव की यह कहानी है।
छतरपुर, बुंदेलखंड। बुंदेलखंड क्षेत्र के कुछ गांवों में सूखे पर काबू पाने के लिए नए प्रयास किए जा रहे हैं। छह साल पहले, मझोत गांव से आये एक 36 वर्षीय सीमांत किसान हलदीन पटेल, मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में अपने पांच सदस्यों वाले परिवार के साथ 10,000 रुपये की आय के साथ जीने की कोशिश कर रहा था। उन्होंने इससे पहले दिल्ली और जम्मू में छोटे मोटे काम किए थे और बंटाई पर दिए गये अपने खेत से भी उन्हें कुछ प्राप्त होता था। अपनी 1 हेक्टेयर जमीन पर उन्होंने रासायनिक उर्वरकों पर आधे से ज्यादा पैसा व्यर्थ किया था।
लेकिन परिस्थतियां तब बदल गईं जब, किसानों को गोबर, गोमूत्र, नीम के पत्ते, पानी और बेसन के प्रयोग से जैविक खाद बनाने का प्रशिक्षित दिया गया। मार्च 2011 में, एक वकालत समूह हरित प्रयास कैरीटस, जो एक गैर लाभ आधारित संस्था थी द्वारा वित्त पोषित उर्वरक बनाने में छोटे और सीमांत किसानों को प्रशिक्षण देना शुरू कर किया।
हलदीन कहते हैं कि ‘‘केवल मैं ही एक ऐसा व्यक्ति हूं जो प्रशिक्षण के बाद 250 परिवारों के एक गांव में अपने ही खाद तैयार करने की हिम्मत कर रहा हूं‘‘ हालांकि सामाजिक दबाव के चलते मैंने उसे अपने खेत के एक कोने में फेंक दिया था लेकिन कुछ समय बाद खेत के उस हिस्से में उगे अदरक को देख कर सब चकित हो गये। यह अदरक अधिक बेहतर और गुणवत्ता में बहुत अच्छे थे।
आज, हलदीन के उत्पादन की लागत कम से कम 5,000 रुपये तक कम हो गई है और उसकी आय, 30,000 से अधिक बढ़ गई है।
इसका प्रभाव आसपास के गांवों में भी देखने को मिला। तीन साल पहले हलदीन की नजर मझौत से 13 किमी दूर बसे एक आदिवासी गांव पर पड़ी और तब हलदीन ने इस गांव के लोगों को जैविक खाद के प्रशिक्षण देने का फैसला किया।
42 वर्षीय मांझी, जो 2 हेक्टेयर भूमि का मालिक कहते हैं कि “बहुत से लोगों ने पलायन करना बंद कर दिया है। हर कोई अब पीछे अपने मवेशियों और अपने स्वयं के खाद तैयार करते हैं,‘‘ और अपने जानवरों का भी ख्याल रखते हैं।

सूखे से निपटने के लिए अखिलेश ने मांगे 11 हजार करोड़ रुपये

सूखे की गंभीर स्थिति का सामना कर रहे उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने प्रधानमंत्री से 11 हजार करोड़ रुपये की मांग की है।
बुंदेलखंड के लिए पानी की ट्रेन की केंद्र की पेशकश को ठुकराने के कुछ ही दिनों बाद अखिलेश यादव ने 10 हजार टैंकर खरीदने के लिए वित्तीय सहयोग मांगा।
यह पूछे जाने पर कि बुंदेलखंड के लिए पानी भेजने की पेशकश को राज्य सरकार ने क्यों अस्वीकार कर दिया, अखिलेश ने कहा कि बुंदेलखंड में पानी है लेकिन सरकार को गांव तक पानी पहुंचाने के माध्यम की जरूरत है।
राज्य सरकार ने टैंकारों, तालाबों और खेत तालाबों समेत 78 हजार जलाशयों को बहाल करने और एक लाख नये जल निकायों के निर्माण से जुड़ी कार्य योजना को भी साझा किया।
बैठक में बताया गया कि राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष के तहत राज्य को 934.32 करोड़ रुपये जारी किये जा चुके हैं।