केरल ने सौ प्रतिशत प्राथमिक शिक्षा प्राप्त कर ली है। असली उपलब्धी है या राजनीतिक चाल?

फोटो साभार विकिपीडिया
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13 जनवरी को केरल सौ प्रतिशत प्राथमिक शिक्षा हासिल करने वाला पहला राज्य बन गया। उपराष्ट्रपति द्वारा इस बारे में आधिकारिक बयान दिया गया और राज्य अपनी उपलब्धी पर फूला न समाया। देश के सबसे साक्षर राज्य ने अपने सभी नागरिकों को कक्षा 4 तक पढ़़ा दिया है। उन्हें पढ़ने, लिखने और हिसाब किताब करने की क्षमताओं से निपुण कर दिया है। 2014 में केरल में लोगांे को प्राथमिक शिक्षा के समकक्ष लाने के लिए ‘अतुल्यम’ कार्यक्रम शुरू किया गया। इसके अंतर्गत 15 से 50 के बीच उम्र के लोगों को ढूंढा गया, पढ़ाया गया और कक्षा 4 के बराबर परीक्षा में बैठाया गया। 2.6 लाख लोगों में से जिन्होंने ये परीक्षा दी, 2.2 उत्तीर्ण हो गए। ‘अतुल्यम’ के अंतर्गत अब अगला कदम सबके लिए 12वीं कक्षा तक की शिक्षा का लक्ष्य है। एक नज़र से देखने पर राज्य का ये मॉडल हमें खुश होने का कारण देता है साथ ही दूसरे राज्यों में भी इसे अपनाने के लिए प्रेरित करता है।
मगर कहीं तो गड़बड़ लगती है। ज़रा इन पर विचार कीजिए – 2011 की जनगणना के अनुसार केरल की साक्षरता घट कर 93.9 प्रतिशत हो गई है। असर द्वारा 2006 से 2014 के बीच देखे गए झुकावों के अनुसार हर साल स्कूलों में नाम लिखवाने वाले विद्यार्थियों की संख्या स्थिर रही है। जबकि कक्षा 3 और 5 में पढ़ने के और हिसाब के स्तर काफी गिर गए हैं। इतना ही नहीं केरल राज्य में ट्राइबलों पर एकमात्र अध्ययन जो केरल महिला समाख्या सोसाइटी द्वारा किया गया बताता है कि हर साल और अधिक ट्राइबल बच्चे स्कूल छोड़ रहे हैं। स्कूल छोड़ने की औसत दर राज्य स्तर पर 36 प्रतिशत है और प्राथमिक स्तर पर 46 प्रतिशत।
इसके अलावा सवाल भी उठाए जा रहे हैं कि कार्यक्रम को शुरू हुए एक साल से थोड़ा ज़्यादा ही हुआ है फिर इतनी जल्दी राज्य सरकार ने सौ प्रतिशत शिक्षा कैसे प्राप्त कर ली? नीलांबुर पंचायत में चलाए गए पायलट प्रोजेक्ट का अवलोकन सरकार से बाहर के लोगो  ने किया था। मगर यहां ऐसा कुछ नहीं किया गया है। ऐसा क्यों लगता है कि सरकार इस उपलब्धि को उद्घोषित करने की जल्दी में है? ये कोई बड़ा राज़ नहीं है कि यह केरल में चुनावी वर्ष है। सत्तारूढ़ दल के लिए अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए इस उपलब्धि का बखान ज़रूरी है। भाजापा के लिए जो धीरे-धीरे केरल में पैर जमा रही है ये असंतुष्टि की वजह है।
चाहे चुनाव का कोई भी नतीजा हो, हम आशा करते हैं कि शिक्षा की जीत होगी।