कूड़ा आउर बिन्दी से चलत परिवार

mahila

जिला वाराणसी, ब्लाक काशी विद्यापीठ, बजरडीहा। दिन भर इधर उधर कूड़ा बीनत बीनत कब जिन्दगी कहां से कहां पहुंच गएल समझ में नाहीं आएल। जरूरी नाहीं हव कि अगर आदमी ना रहे तो जिन्दगी रूक जाए। इ कहब हव बजरडीहा के रजिया सुल्ताना के।
जेकर शादी दू साल पहिले मालदा के जियाबुलहक से भएल रहल। शादी के छह महीना बाद जियाबुलहक रजिया के छोड़ के चल गएल। आज रजिया के लइकी दू साल के हो गइल हव। रजिया बतइलिन की हजार बियाह हमार बुआ हसीना लगइले रहलिन। बियाह के बाद मालूम चलल कि जियाबुलहक पहिले से बियाह कर चुकल रहलन आउर उनके तीन ठे लइकी लइका भी हउवन। लेकिन फिर भी हम उनके साथे रहत रहे। ओन हमसे कह के गइलन कि हम एक या दू महीना में आ जाब। मगर दू साल गइले हो गयल अबहीं तक नाहीं अइलन। का हम उनके बगैर मरल जात हई ? हम कूड़ा बिन के आपन घर आउर पेट पाल रहल हई। एनकरे पति के लापता होवे आउर ससुराल बहुत दूर होवे के वजह से केहू से बात ना हो पाइल।
जिला वाराणसी, ब्लाक अराजीलाइन्स, गांव कचनार। इहां पे लइकिन मेहरारून पत्ता पे बिन्दी चिपकावे के काम कोई पांच साल से करत हव तो कोई दू महीना से। आउर गांव के ज्यादातर मेहरारून इहे काम करलिन। इहां के गुड़िया आउर प्रतिमा के कहब हव कि हमनी इ काम कई साल से करत रहली बीच में छोड़ देहली लेकिन अब दू महीना से फिर करे लगली। इहां के ज्यादातर घर में इहे काम होला। एके बनवावे खातिर शहर से लोग आके दे जालन। एमे बारह पत्ता के एक गड्डी बनअला आउर तीन गड्डी के एक गुरूच तब जाके एक गुरूच के छह रूपइया मिलअला। प्रतिमा बतइलिन कि हम पढ़ाई करीला आउर पढ़ाई के बाद खाली टाइम में बइठे से अच्छा कि कुछ काम कर लेइला। दिन भर में पचास साठ रूपइया के काम हो जाला। आउर इधर इ काम बहुत लोग करअला जेमे अइसन लोग भी हव जेकर दिन दिनभर के काम एही हव।