कुपोषण जैसे गंभीर मुद्दे पर क्यों नरम प्रशासन?

02-01-15 Kshetriya Banda - Kuposhan - Aanganwadi webजिला बांदा। कुपोषण के मामले में जिले की हालत अभी सुधरी नहीं है। बल्कि नवंबर से शुरू हुए सर्वे में चैंकाने वाले आंकडे़ सामने आ रहे हैं। कुछ ब्लाकों में यह पूरा किया जा चुका है कुछ में बाकी है। 1 नवंबर 2014 को उत्तर प्रदेश सरकार ने राज्य पोषण मिशन शुरू किया है। मिशन को चलाने की जि़म्मेदारी सांसद डिंपल यादव को सौंपी गई है। योजना की शुरुआत के वक्त उन्होंने कहा था कि यह एक गंभीर समस्या है। हर साल प्रदेश के एक हज़ार बच्चों में से एक साल से कम उम्र के बयालिस बच्चे कुपोषण की वजह से मरते हैं। ऐसे में प्रशासन में सख्ती दिखने की जगह बांदा के डी.एम. का यह जवाब कि आंगनवाड़ी द्वारा अब तक इन आंकड़ों को दर्ज न करना कोई अपराध तो नहीं है, जो उन पर कार्रवाई की जाए, इस योजना की गंभीरता पर सवाल खड़े करता है।
ब्लाक तिन्दवारी, गांव बरेठीकला। यहां के दो आंगनवाड़ी केंद्रों में सर्वे के दौरान कुल चार अतिकुपोषित बच्चे पाए गए। सी.डी.पी.ओ. प्रतिभा ने बताया कि पूरे ब्लाक में सर्वे होने के बाद दो सौ सैंतालिस बच्चे कुपोषित निकले। इनमें एक सौ चैहत्तर बच्चे अतिकुपोषित हैं। इन बच्चों की लिस्ट डी.एम. को भेजी जा चुकी है।
ब्लाक नरैनी, गांव सढ़ा। यहां की आंगनवाड़ी कार्यकर्ता प्रभा सिंह ने बताया कि उनके केंद्र में सर्वे के दौरान दो बच्चे अतिकुपोषित निकले। इलाज के लिए बच्चों के मां बाप से कुपोषण पुर्नवास केंद्र में दवा कराने की बात की गई पर वह लोग वहां जाने के लिए तैयार नहीं हंै।
डी.एम. सुरेश कुमार प्रथम का कहना है कि अभी तक हुए सर्वे में चैदह सौ बच्चे कुपोषित पाए गए हैं। इनका नाम अब रजिस्टर में दर्ज होगा। कुपोषित बच्चों को पोषाहार दिया जाएगा और अतिकुपोषित बच्चों को पुनर्वास केन्द्र में रखा जाएगा। आंगनवाड़ी केंद्रों की दीवारों कुपोषित और अतिकुपोषित बच्चों का नाम लिखा जाएगा। सूची में मां-पिता का नाम और जाति भी लिखी जाएगी।