कुछ कुछ होता है!

साभार: पिक्साबे क्रिएटिव कॉमन्स

मेरा नाम इरम है। मैं जब 12वीं कक्षा में पढ़ती थी तब मैं अपनी बहन के घर छुट्टियों में रहने गई। वहीं पड़ोस के कई लड़के हमें देखते थे। शायद उनमें शर्त लगी थी कि कौन मुझे पटा पायेगा, पर ‘हमें कभी किसी से प्यार नहीं करना है’ ये मेरे ज़हन में भरा था। हम कभी किसी लड़के को अपने पास फटकने तक नहीं देते थे और अगर किसी ने कोशिश की तो मार दिया करते थे।
पर पता नहीं उन लड़कों के झुण्ड में एक लड़का मुझे थोड़ा-थोड़ा अच्छा क्यों लगने लगा – मुझे वह हर समय ताका करता था। हम मकान की छत में हों या और कहीं भी और, वह सामने होता था। हम उससे बचनें लगे थे पर कुछ-कुछ मन में होता था। वह एक महीना आंखो ही आंखो के इशारे और फ्लाइंग किस में कब निकल गया पता ही नहीं चला। अब मेरी वापसी का समय आ गया और मैं बांदा आ गई। मुझे उसकी एक एक बात याद आने लगी – उसका हंसना, आवाज देना, जिन्दादिली, बिंदास रहना, और गरीबों पर पैसा खर्च करना। वह मुझे प्यार से पंजाबिन कहकर बुलाता था। हम बोलते तुम गोरे हो और मैं सांवली हूं तो वह खूब तेज हंसता और गाना गाने लगता, वह सब मुझे याद आता था। मेरी सहेली रूबी को सब मैंने बताया कि मुझे आसिफ से प्यार हो गया है – हाँ उसका नाम आसिफ था। हमें उससे मिले छह माह हो गये थे और मैं कालेज जाने लगी थी तभी मेरी बहन के घर शादी में मैं दुबारा गई। वह घर के बाहर मेरे आने का इंतजार कर रहा था। मुझे देखकर खिल उठा और मैंने भी धीरे से मुस्कुरा दिया। शादी के माहौल में हमारा प्यार और भी बढ़ता चला गया, उसके सारे दोस्त जान गये थे कि हम लोग एक दूसरे को पसंद करते हैं। उसके घर में फोन लगा था और हम नम्बर लेकर बांदा वापस आ गये। कालेज के सामने के पीसीओ से फोन पर हमारी बात हो जाती थी।
मेरे घर वालों ने शादी से साफ़ इनकार कर दिया और फिर दोस्त भी साथ में आया, हमें एक रूम में बैठा दिया गया जहां उसने मुझे पहली बार गले से लगाया और किस किया। हम लोगो ने शादी करने का फैसला किया और अपने घरों में बता दिया, उसके घर वाले तैयार हो गये पर हमारे घरवालों ने मना कर दिया और हमसे कहा कि वह मुसूरी जाति के हैं और हम नहीं करवाएंगे शादी। हमने अपने दिल को रोंककर आसिफ से मना कर दिया कि तुमसे शादी नहीं कर सकते पर प्यार जिन्दगी भर करते रहेगें।
हम दोनों की शादी किसी और से हो गयी। पर दिलों में प्यार कभी कम नहीं हुआ। मेरी शादी ज्यादा दिन नहीं चली और मैं अपने मायके आ गई। मायके आने के दो साल बाद हमने एक दिन आसिफ को फोन लगाया और उसी ने फोन उठाया। जैसे हमने हेलो बोला वह मेरी आवाज समझ गया और बहुत खुश हुआ और साथ ही अफसोस भी किया कि मेरी जिन्दगी में इतना बडा हादसा हुआ है। इस बीच हमारी बातें होने लगीं और वह हमसे मिलने को कहने लगा, हम भी उससे मिलना चाहते थे। हमने उससे मिलने का समय तय कर लिया और बहुत सारी बातें की। हम लोगों ने तय किया कि हम लोग शादी तो नहीं कर सकते पर एक दूसरे से मिल तो सकते हैं। उसने बोला कभी भी बुलाओगी मुझे अपने सामने पाओगी।