का सोच के सरकार करिस फैसला

karvi sampaadakiyaशासन प्रशासन फैसला सुनावैं मा देर लगावत हवै पै देर होय के बादौ इनतान का फैसला करत हवै कि जनता पहिले से ज्यादा अउर परेशान होइ जात हवै। सरकार काहे नहीं जनता के आवाज का सुनत हवै। उत्तर प्रदेश के बुन्देलखण्ड क्षेत्र मा हमेषा मड़ई परेशान रहत हवै। कत्तौ पानी तौ कत्तौ सूखा से मड़ई जूझत रहत हवैं पै या समय चित्रकूट जिला मा जघा जघा धरना प्रदर्शन होत हवैं। काहे से मानिकपुर ब्लाक का तहसील बनावैं खातिर दस बरस से बात चलत हवै। तहसील बनवावैं खातिर जनता भी तैयार हवै। यहिके खातिर 15 अक्टूबर 2012 मा मुख्यमंत्री अखिलेश सिंह यादव चित्रकूट आय रहैं। तबै उंई कहिन कि मानिकपुर मा जल्दी से जल्दी तहसील बनी। या बात से जनता बहुतै खुश भे कि उनका तीस तीस रूपिया किराया लगा के कर्वी तहसील न आवैं का परी। पै का पता रहै कि सरकार गुड़ देखा के ईटा मारत हवै। सरकार तौ तुरतै आपन पांसा पलट दिहिस। सरकार अब आदेश दिहिस हवै कि कर्वी तहसील से लाग एक सौ बाइस गांवन का मानिकपुर तहसील मा शामिल कइ दिहिस हवै। या बात का लइके जनता बहुतै गुस्सा मा हवै। जउन गांव कर्वी के मानिकपुर मा लाग हवै। उंई गांवन का किराया बीस रूपिया से लइके साठ रूपिया तक लागी। जउन कर्वी मा बहुतै कम लागत रहै। सरकार का सोच के या फैसला लिहिस हवै? वा जनता का हित देखत हवै या फेर आपन बस? सरकार जनता के समस्या का हल निकालै खातिर होत हवै न कि उनकर बढ़ावै खातिर?