कासगंज विधानसभा सीट की अनोखी कहानी

कासंगज विधानसभा सीट उत्तर प्रदेश विधानसभा की सीट 403 विधानसभा सीटों में 100 नंबर पर और एटा लोकसभा सीट के अतंर्गत आती है। इस सीट को लेकर लोगों का मानना है कि जिस किसी पार्टी ने इस सीट पर जीत दर्ज की है, उत्तर प्रदेश में उसी ने सत्ता पर राज किया है।
यह चौकाने वाले रिकॉर्ड 43 साल में हुए 11 विधानसभा में देखने को मिले हैं। हालिया उदारहण में साल 2012 में यहां सपा के मानपाल सिंह ने जीत हासिल की थी। जिससे इस चुनाव में सपा ने ही यूपी में शासन की बागडोर संभाली थी। इसके बाद 1980 में हुए चुनाव में एक बार फिर कांग्रेस ने इस सीट पर वापसी की। इसके बाद वह पुन: 1985 में भी इस सीट पर जीते थे। इन सालों में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस ने शासन किया था। इसके बाद 1989 में यहां से जनता पार्टी के एमएलए गोवर्धन सिंह ने जीत हासिल की थी। इस साल जनता पार्टी से मुलायम सिंह यादव यहां के मुख्यमंत्री थे। 1991 में हुए विधान सभा चुनावों में इस सीट से बीजेपी के एमएलए नेत्रराम सिंह ने कासगंज सीट पर जीत हासिल की थी। इसके बाद यूपी में बीजेपी ने पूर्ण बहुमत में सरकार बनाई।
इसके बाद 1993 में इस सीट से कल्याण सिंह ने चुनाव लड़ा था। जिससे इस क्षेत्र में उन्हें जीत हासिल हुई। हालांकि यह विधानसभा चुनाव त्रिशंकु था, लेकिन इसमें भाजपा एक बड़ी पार्टी थी। वहीं सपा और बसपा का संगठन किया गया था। इसके बाद 1996 में एक बार फिर इस सीट पर नेत्रराम सिंह वापस आए। इस बार भी भाजपा को त्रिशंकु विधानसभा चुनाव परिणाम थे। साल 2002 में यहां पर समाजवादी पार्टी ने अपनी जगह बना ली। इस सीट पर बीजेपी प्रत्याशी की जगह समाजवादी पार्टी के मानपाल सिंह ने जीत हासिल की। यहां पर 2007 में बहुजन समाजवादी पार्टी की ओर विधायक हसरत उल्ला शेरवानी ने जीत हासिल की। हालांकि इस बार भी यह चुनाव त्रिशुंक था लेकिन यूपी में बसपा ने शासन किया। इस बार गठबंधन वाली सरकार यूपी को नहीं मिली थी। और 2012 में भी यहां पर सपा के विधायक ने ही जीत हासिल की थी। हालांकि इस सीट को लेकर यह भले ही एक इत्तेफाक हो लेकिन अब लोगों का मानना यही हैं। उनका यही कहना है कि कि यहां पर जिस पार्टी के प्रयाशी को जीत हासिल होगी यूपी में उसी पार्टी का मुख्यमंत्री बनेगा।
अब देखना है कि आखिर इस बार इस सीट पर किसकी जीत होगी और क्या ये बात इस बार भी सच साबित होगी या नहीं।