कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के मामले में 70 फीसदी महिलाएं नहीं करती हैं रिपोर्ट

साभार: इंडियास्पेंड

वर्ष 2012 में दिल्ली सामूहिक बलात्कार के मद्देनजर कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 बनाया गया है। हालांकि वर्ष 2017 में भारतीय बार एसोसिएशन द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार, 70 फीसदी ने महिलाओं ने खराब परिणाम की आशंका में अपने वरिष्ठ अधिकारी के खिलाफ यौन उत्पीड़न की शिकायत करने से मना किया है। इस सर्वेक्षण में 6047 महिलाओं को शामिल किया गया है।
उपलब्ध आंकड़ों और कामकाजी महिलाओं के साथ बातचीत पर इंडियास्पेंड द्वारा किए गए विश्लेषण से पता चलता है कि उत्पीड़न के मामलों में वृद्धि हुई है। वर्ष 2014 से 2015 के बीच, कार्यालय परिसर के भीतर यौन उत्पीड़न के मामले दोगुने हुए हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार, यह संख्या 57 से 119 हुई है। कार्य से संबंधित अन्य स्थानों पर यौन उत्पीड़न के मामलों में 51 फीसदी की वृद्धि हुई है। यह आंकड़े वर्ष 2014 में 469 से बढ़ कर वर्ष 2015 में 714 हुआ है।
लोकसभा में दिसंबर 2016 में दिए गए एक जवाब के अनुसार, वर्ष 2013 से 2014 के बीच, राष्ट्रीय महिला आयोग की शिकायतों में 35 फीसदी वृद्धि दर्ज की गई है। यानी आंकड़े 249 से बढ़ कर 336 हुए हैं।
संख्या में वृद्धि के बावजूद, महिलाओं की शिकायतों पर नियोक्ताओं द्वारा प्रभावी ढंग से सुनवाई नहीं की जाती या तो नियोक्ताओं को कानून के प्रावधानों की जानकारी नहीं है या फिर उन्हें आंशिक रूप से लागू किया है और यहां तक यदि आंतरिक पैनलों की स्थापना भी की है तो उनके सदस्य ठीक तरह से इस मामले में प्रशिक्षित नहीं है।
इन सब के ऊपर, आज भी यहां के संस्थानों में लैंगिक समानता कम है। इस असमानता को देखना हो तो ‘द एनर्जी एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट’ के उस हाई-प्रोफाइल मामला को देखें, जहां एक महिला को स्पष्ट सबूत होने के बावजूद कंपनी के पूर्व महानिदेशक आर के पचौरी के खिलाफ उत्पीड़न के मामले में दो साल तक की लड़ाई लड़नी पड़ी।
ये समस्याएं सिर्फ निजी और सार्वजनिक क्षेत्र के प्रतिष्ठानों में ही नहीं हैं, बल्कि अपेक्षाकृत नए सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) कंपनियों में भी हैं।
कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 के अनुसार, हर निजी या सार्वजनिक संस्थान, जहां 10 या अधिक कर्मचारी काम करते हैं, वहां एक आंतरिक शिकायत समिति (आईसीसी) होना अनिवार्य है। हालांकि, 36 फीसदी भारतीय कंपनियां और 25 फीसदी बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने आईसीसी का गठन नहीं किया है।
वाणिज्य और उद्योग चैंबर भारतीय महासंघ (फिक्की) द्वारा वर्ष 2015 में किए गए एक अध्ययन ‘फॉस्टरिंग सेफ वर्कप्लेसेज’ से पता चलता है कि उनके आईसीसी के सदस्य कानूनी रूप से प्रशिक्षित नहीं हैं। वहीँ, 40 फीसदी आईटी और 50 फीसदी विज्ञापन और मीडिया कंपनियां कानून से बेखबर हैं।??