कारवाही के गुणवत्ता मा लाग है प्रश्न चिन्ह

दिनै दिन बढ़त बलात्कार अउर अपहरण के मामला कानून व्यवस्थाका चुनौती देत है। मामला का अंजाम दें वाला शायद या महसूस करावैं के कोशिश करत है कि वहिका अदालत, सजा भोगै, जेल जाय अउर कानून के रक्षा करैं वाली पुलिस का तनिक भी डेर निहाय। का पुलिस या चुनौती का पार कई पाई?
अगर कारवाही के बात कीन जाए तौ बलात्कार अउर अपहरण जइसे के मामलन मा पुलिस कारवाही के खानापूर्ति बहुतै जल्दी करत है। इनतान मा पुलिस का लापरवाह कहब बेइमानी होई। आम जनता या भी आरोप लगावत है कि पुलिस रूपिया के पियासी रहत है। वा जेहिसे से भी रूपिया पा गे वहिके पक्ष मा तुरतै कारवाही होत है। शायद यहै कारन है कि घटना का अंजाम दें वालेन के भीतर डेर नाम के चीज नहीं रहि गे आय। दूसर बात पुलिस का स्टाफवाद, जातिवाद अउर रिश्तेदारी भी अपराधी के मन से कारवाही का डर हटा दिहिस है। अगर घटना करैं वाला पुलिस के जाति का, स्टाफ का या फेर रिश्तेदारी का होय तौ भी कारवाही बहुतै कम होत है। कारवाही कीन जात है तौ सिर्फ खानापूर्ति खातिर ताकि न ‘सांप मरै न लाठी टूटै’। पुलिस इं बातै मानै या नहीं पै एक दरकी इं बातन का गहराई से सोच विचार करै। घटना मा रोक न लागै के कारन पुलिस के ऊपर कइयौ तान के बातैं होत हैं तौ या सोच के साथै विचार कीन जाय कि पुलिस के कमी कहां रहि जात है। जनता तौ पुलिस अउर कानून व्यवस्था से या उम्मीद राखैं चाहत है कि इनतान के कारवाही होय कि घटना का अंजाम दें के कोहू के जुर्रत ही न परै। कउनौ भी अपराध करैं से पहिले बीस बारी सोचैं का मजबूर होय कि यहिकर अंजाम का होई। पुलिस कारवाही करैं मा पीछे निहाय पै कारवाही के गुणवत्ता मा सबसे बड़ा प्रश्न चिन्ह है?