कागज में सब जगह बिजली

3. kasba katehri EDITED2उत्तर प्रदेश के कउनों भी जिला अइसन ना होई जहां ठीक से बिजली आवत होई। बिजली के तार तो सभहीं जगह फइलल रहअला लेकिन बिजली के पता नाहीं रहत। लेकिन सरकार आय दिन ढिंढोरा पीटअला कि चैबीस घण्टा में बीस घण्टा लाइट ज़रूर मिली। पर इ सब खाली नियम में हव गांव में नाहीं। एही सब समस्या से बनारस के कई गांव आउर शहर के लोग भी जूझत हयन।
बनारस जिला के आबादी लगभग तीस लाख हव जवने में से ज्यादातर लोग के बिजली के कउनों सुविधा नाहीं हव। आउर लोग के पूरा पूरा रात अंधियारे में बितावे के पड़अला। तब सरकार के चैबीस घण्टा वाला बिजली कहां चल जाला? कहीं तो तीन दिन बाद लाइट देला तो कहीं एक हफ्ता बाद देला आउर अगर लाइट दे भी देई तो दिन में दस दस बार काटी। जइसे ब्लाक चोलापुर के बेला गांव में लाइट के पता भी नाहीं हव। आउर ब्लाक चिरईगांव के सन्दहा गांव काशी विद्यापीठ के कोटवां, सुरहीं के लाइट देई तो अइसन देई कि इन्सान के परेषान करके रख देई। अइसन भी जगह हव जहां बिजली के खम्भा तो लग गयल हव लेकिन ना तो बिजली कनेक्षन के तार फइलल हव आउर ना लाइट के पता हव। आखिर काहे सरकार कहअला कि सबके बराबर लाइट मिली। का सरकार के इ सब गांव नाहीं देखात हव कि बिजली हव कि नाहीं। बस यही नाहीं जहां सरकार के फायदा रहअला आहिजे लाइट देला बाकी सब गांव सरकार के नाहीं सुझात हव?