कर्ज से परेशान बाँदा जिले के खम्भौरा गाँव के किसान ने की आत्महत्या

जिला बांदा, गांव खम्भौरा, अक्टूबर 2016। बुंदेलखंड में हर तीसरे दिन में एक किसान आत्महत्या करता है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि पिछले एक साल में 40 से 60 किसानों ने आत्महत्या की है, लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और ही सच्चाई की तरफ इशारा करती है। बांदा के खम्भौरा गाँव में कष्ण प्रसाद की भी गिनती अब आत्महत्या करने वाले किसानों में होगी।

केशना प्रसाद, उम्र 55, ने तीन लाख रुपये के कर्ज को नहीं चुका पाने के कारण 13 अक्टूबर 2016 को फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। लगतार दो साल से सूखे के कारण कोई उपज नहीं हो रही थी और बच्चों की पढ़ाई और घर खर्च चलाने के लिए क़र्ज़ लेने के अलावा केशना के पास कोई विकल्प नहीं था। केशना ने 2 लाख रुपये किसान क्रेडिट कार्ड से कर्ज लिया था, साथ में उन्होंने अपनी 5 बीघा जमीन एक लाख रुपये में गिरवी रखी हुई थी। उनके कर्ज लौटाने की आखिरी तारीख 20 जून 2018 थी। पर केशना ने उससे पहले ही फांसी लगाकर खुद को खत्मकर दिया।

केशना के पांच बच्चे हैं। उनके अलावा घर में कमाने वाला उनका बड़ा बेटा, राम चन्द्र है। 2 लाख रुपये का क़र्ज़ चुकाने के लिए खेती के साथ सब्जी का ठेला भी लगाया। पर वह सब्जी के ठेले से भी रकम नहीं जुटा सके। केशना ने कर्ज की बड़ी रकम से तंग आकर 13 अक्टूबर 2016 को आत्महत्या कर ली। उन्होंने दोपहर में घर के कमरे में पंखे से फांसी लगा ली। जब उनकी पत्नी शान्ति ने दरवाजा खटखटाया तो काफी देर तक दरवाजा नहीं खोला। उसके बाद पड़ोसियों की मदद से रोशनदान से कमरे के अन्दर देखा तो उन्हें फांसी के फंदे में झूलता पाया।

केशना की पत्नी शान्ति, उम्र 48, रोते हुए बताती हैं, “मेरा लड़का काम पर चला गया था और मैं भी गाय को चरने के लिए चली गई। शाम को देखा तो उन्होंने आत्महत्या कर ली थी। वह हमेशा खूब सोचते थे, मैं हमेशा कहती थी कि इतना मत सोचा करो। हम काम- धंधा करके पैसे चुका लेंगे।”

केशना के मरने के बाद पूरा गांव गम में डूबा हुआ है। उनके घर में परिवार को संभालने के लिए पड़ोसी और रिश्तेदार आ रहे हैं। केशना की पत्नी की हालत बहुत बुरी है, वह बीच-बीच में पुरानी बातों को याद करके जोर-जोर से रोने लगती है। केशना के पांचों बच्चे भी अपने पिता के इस तरह चले जाने से हैरान और दुखी हैं।

केशना के बेटे राम चन्द्र इस घटना की जानकारी देते हुए बताते हैं, “दोपहर में जब हम खाना खाने के लिए आए तो वह लेटे हुए थे। उसके बाद मैं चला गया। मेरी मां भी घर से बाहर चली गई थी। आत्महत्या के समय दो बहने घर में थी। पर वे भी दूसरे कमरे में अपने-अपने काम में लगी थीं। जब मां लौटकर आई तो उन्होंने देखा कि पिताजी ने आत्महत्या कर ली है।” राम चन्द्र को कर्ज की ज्यादा जानकारी नहीं हैं क्योंकि उसके पिता उन्हें कर्ज के बारे में नहीं बताते थे।

आज केशना खत्म हो चुका है, पर एक सवाल अभी भी बना हुआ हैं कि कर्ज का पैसा कैसे दिया जाएगा, इसकी चिंता अब केसना के पूरे परिवार को है।

रिपोर्टर- मीरा और गीता 

19/10/2016 को प्रकाशित