कमजोर भावनात्मक रुख और अभिभावकों की कम आकंछा के कारण छूट रही है पढ़ाई

साभार: विकिमीडिया कॉमन्स

बच्चों के स्कूल छोड़ने का मुख्य कारण कमजोर भावनात्मक रुख और उनके माता-पिता की शिक्षा के प्रति कम आकांक्षाएं हैं। यह बात आंध्र प्रदेश में 12 से 1 9 वर्ष के बीच 834 बच्चों पर किए गए सर्वे से बता चली है।  यंग लाइवस इंडिया के अनुसार कम आत्मबल वाले बच्चों की तुलना में अधिक आत्मबल वाले बच्चों में 19 वर्ष तक शिक्षा जारी रखने की संभावना 1.4 गुना ज्यादा है।
ऐसे माता पिता जो अपने बच्चों के लिए अधिक शिक्षा पूरी करने की इच्छा रखते थे, उनमें स्कूली शिक्षा जारी रखने की संभावना तीन गुना अधिक होती है। वहीं ऐसे माता पिता जो अपने बच्चों को 20 साल की उम्र में शादीशुदा देखना चाह रहे थे, उन बच्चों में पेशेवर बनने की इच्छा 1.8 गुना कम थी। साथ ही 10 % सबसे गरीब परिवारों के बच्चों की तुलना में सबसे समृद्ध 10 % परिवारों के बच्चों में 19 वर्ष की आयु तक शिक्षा जारी रखने की संभावना दुगुनी है।
इस सर्वे के अनुसार छात्रों में से 57.3 % ने 19 साल की उम्र में शिक्षा जारी रखी, जबकि 42.7 % ने 12 और 19 की उम्र के बीच स्कूल छोड़ा है। इसके विपरीत, जिन्होंने कम आत्म-प्रभावकारिता सूचकांक स्कोर किया है, उनमें से 8.5 % अब भी 19 साल की उम्र में स्कूल में थे, और 51.5 %ने 19 वर्ष की उम्र तक स्कूल छोड़ा था। इसी तरह, उच्च व्यक्तिपरक कल्याण की रिपोर्ट करने वाले छात्रों का स्कूल में रहने की संभावना अधिक थी। उच्च व्यक्तिपरक कल्याण की सूचना देने वाले 64 फीसदी ने 19 वर्ष की आयु तक शिक्षा जारी रखी, जबकि 36 % ने 19 वर्ष की आयु तक पढ़ाई छोड़ दी । लेकिन कम व्यक्तिपरक कल्याणकारी की सूचना देने वालों में 44.2 % ने शिक्षा जारी रखी थी और 55.8 % ने 19 वर्ष की आयु तक पढ़ाई छोड़ दिया।
अध्ययन के अनुसार कम स्तर की तुलना में आत्म-प्रभावकारिता के उच्च स्तर वाले बच्चों की आयु 19 वर्ष तक की शिक्षा को जारी रखने की संभावना 1.4 गुना अधिक है। इस सर्वे में 70 % अभिभावकों ने अपने बच्चों के बारे में माध्यमिक शिक्षा और उससे आगे बढ़ने के लिए आकांक्षा जताई, जबकि 30 % ने अपने बच्चों से माध्यमिक विद्यालय से ज्यादा पढ़ने की अपेक्षा नहीं की । जिन माता पिता ने अपने बच्चों को माध्यमिक शिक्षा या अधिक करने की पढ़ने की इच्छा थी, उन बच्चों में स्कूली शिक्षा जारी करने की संभावना तीन गुना अधिक थी।
उन बच्चों की तुलना में जिनके माता पिता ने उन्हें 20 साल की आयु तक पेशेवर बनने की इच्छा रखी थी, इन बच्चे की तुलना में 20 साल की आयु में गृहिणी बनने की इच्छा देखने वाले बच्चों में उनकी शिक्षा जारी रखने की संभावना 1.8 गुना कम थी। 61 % पहले जन्म लिए बच्चों ने 19 की उम्र तक स्कूल जारी रखा, जबकि चौथे या बाद के जन्म लिए बच्चों के लिए यह प्रतिशत 40.3 हैं। अनुसूचित जाति की तुलना में अनुसूचित जनजाति के बच्चों की 19 वर्ष की आयु में स्कूल में होने की संभावना दोगुनी थी।