कब और कहाँ से आया चश्मा? जानिये, अपने चश्मे का इतिहास…

chashma-wwचश्मे का इतिहास कुल सात सौ साल से भी अधिक पुराना है। चश्मे का आविष्कार 1286 ई. में, इटली के नगर, पीसा के एक दस्तकार ने किया था। अफ़सोस कि इस महान आविष्कारक का नाम भी अब हम नहीं जानते हैं।
हालांकि इस अज्ञात दस्तकार के इस महानतम खोज को लोकप्रिय बनाने का काम किया एक रोमन कैथोलिक भिक्षु आलेजान्द्रो डेला स्पिना ने। वेनिस में काँच-उद्योग की मौजूदगी ने भी तेरहवीं-चौदहवीं सदी में चश्मे को इटली में लोकप्रिय बनाने और उसके उत्पादन में योगदान दिया।
पेट्रार्क (1304-74) ने भी, जिन्हें मानववादियों में अग्रणी माना जाता है और जो अपनी प्रेमपूर्ण कविताओं के लिए जाने जाते हैं, अपनी किताब ‘लेटर्स टु पोस्टारिटी’ में अपनी नजर के कमजोर होने और चश्मे का इस्तेमाल करने का उल्लेख किया है।
बगैर प्रकाश-विज्ञान (ऑप्टिक्स) के विकास को समझे चश्मे के इतिहास को नहीं समझा जा सकता। प्राचीन ग्रीक में, अरस्तू से पूर्व यह धारणा थी कि चीजें हमें इसलिए दिखाई देती हैं, क्योंकि हमारी आँखों से निकलने वाली ज्योति उन पर पड़ती है। यूक्लिड ने इस धारणा को ख़ारिज करते हुए बताया कि चीजें ख़ुद प्रकाश की किरणें आँखों तक भेजती हैं, जिसकी वजह से वे हमें दिखाई देती हैं। लेकिन ऑप्टिक्स पर सबसे क्रांतिकारी और विचारोत्तेजक किताब लिखी, इब्न अल-हयथम ने।
11वीं सदी में लिखी गई, अल-हयथम की किताब का शीर्षक था: “किताब अल-मनाज़िर” यानी बुक ऑफ ऑप्टिक्स। यह किताब 1572 ई. में लैटिन भाषा में अनूदित हुई।
मध्यकालीन इस्लाम और विज्ञान के गंभीर अध्येता हॉवर्ड टर्नर के अनुसार, अल-हयथम ने पहले तो इस बात का अध्ययन किया कि अलग-अलग माध्यमों (मीडियम) से, मसलन, हवा, पानी, काँच आदि से गुजरते हुए प्रकाश की किरणें कैसे अपवर्तित होती हैं या विचलित होती हैं। अल-हयथम ने यह भी दिखाया कि कैसे सूर्यास्त के समय क्षितिज से नीचे रहते हुए भी सूर्य, हमें वातावरण में होने वाले प्रकाश के अपवर्तन के कारण दिखाई देता है।
चीन में भी 15वीं सदी के मध्य में चश्मे के प्रयोग का पहला उल्लेख मिलता है।
दूर दृष्टिदोष के लिए तो उत्तल लेंस का प्रयोग 16वीं सदी से पहले ही होने लगा था, पर निकट दृष्टिदोष के लिए अवतल लेंस का प्रयोग 16वीं सदी में ही शुरू हो सका। लेंस की क्षमता का ठीक-ठीक अंदाज़ा न होने की वजह से लंबे समय तक सही चश्मे के लिए लोगों को ‘ट्रायल-एंड-एरर’ (इस्तेमाल के बाद सही या गलत बताना)की प्रणाली पर ही भरोसा करना पड़ता था।

साभार: यूथ की आवाज़