एक स्कूल जिसने इतिहास के पन्नों को सजा रखा है

धमतरी से सटा हुआ गाँव लोहरसी में स्थित प्राथमिक कन्याशाला कई मायने में खास है। इस स्कूल की स्थापना आज़ादी की 29 साल पहले 1918 में हुई थी और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है की स्थापना वर्ष से आजतक यानि पिछले 96 साल तक के छात्राओं के नाम के रजिस्टर आज भी यहाँ सहेज कर रखी गई है।

उन तमाम दस्तावेजों में से एक है प्रमोशन बुक, पुत्री शाला, लोहरसी, तहसीलधमतरी, ज़िला रायपुर। यह रजिस्टर को यूं तो बीच में दोतीन जगह दीमक खा गया है, पर कुछ नामों और सूचना को छोड़ सब स्पष्ट है। नाम वगैरह के लिखावट से पता चलता है कि यह उस समय के कलम जिसे स्याही बॉटल में डुबाके लिखा जाता था, उसमें लिखा गया है।

जिसमें नाम के लिए अलग, अभिभावक के लिए अलग और जाति के लिए अलग कॉलम था, इसलिए उसमें नाम के साथ जाति नहीं लिखा गया था, वह अलग खाने में लिखा गया था। उसी तरह से उन दस्तावेजों से यह पता चलता है कि उस समय क्या क्या विषय थे, जैसे साहित्य में संभाषण, कहानी, अभिनय, गद्ध, भाव ग्रहण, शब्द भंडार, पद्ध पादक, पुस्तक, कवितार्य, श्रुतिलिपि, प्रतिलिप और हस्ताक्षर। वैसे ही गणित पाठ में गिनना, योगांतर, सूत्र, इबारती, पहाड़ा, संख्या, लेखन, सादा, जोड़बाकी, मूलक्रिया और मौखिक।

इन दस्तावेजों से यह भी पता चलता है कि बहुत सारी लड़कियां बड़ी हो जाने के बाद या सयानी हो जाने के बाद आगे कि पढ़ाई नहीं करती थीं। यह बात उनके स्कूल छोड़ने कि वजह में लिखा गया है। इसके अलावा कई बच्चियों के स्कूल छोडने कि वजह पलायन और गरीबी के रूप में दर्ज है।

इस तरह से उन दस्तावेजों के अध्ययन से उस समय के शिक्षा और समाज के बारे में कई जानकारी मिलती है। 1918 के उस रजिस्टर से यह पता चलता है कि इस प्राथमिक शाला का नाम पहले पुत्री शाला था, जो बाद में बदलकर प्राथमिक कन्याशाला हुआ। 1918 में यहाँ 64 लड़कियां पढ़ती थीं, जब कि आज यहाँ कूल छात्राओं कि तादाद 74 है। जिनमें से एक अनुसचित जाति, 12 अनुसूचित जन जाति और बाकी 21 पिछड़े वर्ग से हैं। स्कूल में अभी कूल मिलाकर 3 शिक्षक हैं, जिनमें से एक नीलिमा नेताम हैं जो पिछले 5 सालों से इसी स्कूल में हैं।