एक बेबाक कवियत्री का देहांत

simmi jiसाल 2009 में इरान में हुए विवादित चुनावों के खिलाफ लिखी कविता-
’मेरी मातृभूमि मैं तुम्हें दोबारा बनाऊंगी
अपनी आत्मा की ईंटों से
मैं फिर तुम्हारे खंभों को खड़ा करूंगी
अपनी हड्डियों के टुकड़ों से’

इरान की जानी मानी कवियत्री सिमिन बहबहानी का देहांत 19 अगस्त को हो गया। उनकी उम्र 87 साल थी। सिमिन दो हफ्तों से ज़्यादा समय से कोमा में थीं। उन्हें ‘इरान की शेरनी’ के नाम से जाना जाता था। इन्होंने देश में अभिव्यक्ति की आज़ादी न होने, मानवाधिकारों से जुडे मसलों पर खुलकर कविताएं लिखीं।
सिमिन बहबहानी की कविताओं का अंग्रेज़ी में अनुवाद करने वाले फरज़नेह मिलानी ने बताया कि इरान देश का इतिहास सिमिन की कविताओं के ज़रिए बेहतर ढंग से जाना जा सकता है।
सिमिन की एक बेहद चर्चित कविता ‘वेश्यालयों के गीत’। यह कविता यहां के शहर तेहरान में रह रही वेश्याओं और उनके ठिकाने यानि वेश्यालयों के बारे में थीं। सिमिन बहबहानी ने महिलाओं की आज़ादी को लेकर कविताएं लिखीं। देश की सरकार के खिलाफ आवाज़ उठाती कविताओं के लिए कई बार इनकी विदेशी यात्राओं पर रोक लगा दी गई। ‘मेरे देश को हवा में फेंकने से बाज़ आओ’ शीर्षक से लिखी कविता के ज़रिए उन्होंने सरकार का विरोध जताया।

कविता का अंत भी उनके बेबाक और साहसी रवैए को दर्शाता है, आखिरी लाइनों में वह कहती हैं –
तुम्हारी इच्छा मुझे जलाने या मुझ पर पत्थर फेंकने की हो रही होगी।
लेकिन तुम्हारे हाथों में पकड़ी गई माचिस और पत्थर दोनों ही मुझे नुकसान पहुंचाने में असमर्थ हैं।