एक चम्मच चीनी से इलाज नहीं होता

s3आपमें से कई होमियोपैथी की चमत्कारी इलाज की ताकत के कायल होंगे। या अगर आप खुद नहीं तो आपकी जान पहचान में कई लोग होंगे जो इसकी इलाज करने की चमत्कारिक ताकत की कसमें खाते होंगे। शायद आपकी कोई आंटी होंगी जिनका अस्थमा होम्योपैथी से बिलकुल ठीक हो गया। या कोई कजऱ्न जिसकी एलर्जी बिलकुल ठीक हो गई। कई लोग बोलते हैं कि ये बहुत सस्ती होती है। इसके कोई साइड इफेक्ट नहीं होते। और सबसे लम्बी चलने वाली और मुश्किल से ठीक होने वाली बीमारियों को ठीक कर देती हैः सभी बीमारियों को माईग्रेन से लेकर मलेरिया तक। इसके बारे में ये सोच ही है जिसकी वजह से लोग रोज़ प्लास्टिक की बोतलों से ये मीठी चीनी की गोलियां लेते हैं।

1995 से भारतीय सरकार भी होमियोपैथी का समर्थन कर रही है। उसने इसे परंपरागत भारतीय चिकित्सा व्यवस्थाओं के साथ आयूष विभाग – (आयुर्वेद, योग, नेचुरोपैथी, यूनानी, सिद्धा और सोवा, रिघ्पा और होमियोपैथी) में मिला दिया है। नवंबर 2014 में एनडीए सरकार ने आयूष को मंत्रालय में बदल दिया। आयूष के अंतर्गत होमियोपैथी पर राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य अभियान ने प्रमुख रूप से ध्यान केंद्रित किया है। इसके द्वारा होमियोपैथिक चिकित्सा देश के ग्रामीण क्षेत्रों में सैकड़ों प्राथमिक और कम्युनिटी स्वास्थ्य केन्द्रों, आयूष डिस्पेंसरियों और अस्पताओं में प्रदान की जा रही है।

मगर क्या आपको पता है कि होमियोपैथी न तो भारतीय है और न ही चिकित्सा है? दिसंबर में मशहूर वैज्ञानिक पत्र्ािका ‘नेचर’ ने इसे उन विज्ञान के मिथकों की सूची में शामिल किया जो खत्म नहीं हो रहे हैं। मिथक है, ‘कि होमियोपैथी काम करती है’ क्योंकि उनका कहना है, ‘कि ये ऐसा नहीं करती’। वैज्ञानिकों और एलोपेथिक डॉक्टरों ने लम्बे समय से माना है कि होमियोपैथी का मूल सिद्धांत तर्क की अवहेलना करती है। इसमें इलाज एक तत्व को तब तक विरल कर के किया जाता है जब तक उसका नामोनिशान खत्म न हो जाए।

छह साल पहले ब्रिटेन देश के वरिष्ठ वैज्ञानिकों के एक समूह ने विश्व स्वास्थ्य संगठन से कहा कि वो एशिया और दक्षिण अफ्रीका में एचआईवी-एड्स, मलेरिया, टीबी जैसी गंभीर बीमारियों के लिए होमियोपैथी के प्रयोग को सार्वजनिक रूप से गलत ठहराए।

इसके अलावा, आयूष जो आपको यकीन दिलाना चाहता है उसके बिलकुल विपरीत होमियोपैथी में ज़रा भी भारतीयता नहीं है। ये कोई पुरातत्व भारतीय चिकित्सा नहीं है। इसे एक जर्मन फिज़ीशियन डॉ. क्रिश्चियन फ्राइडरिक सैम्यूल हानेमान ने 1796 में ईजाद किया था। इसी साल दुनिया का पहला टीका भी एक इंग्लैंड देश के फिज़ीशियन एडवार्ड जेनर द्वारा बनाया गया था। उसने देखा कि ग्वालिनें जो ज़्यादातर समय गायों के पास गुज़ारती हैं और कई बार काओपॉक्स बीमारी (मंद, प्राणघाती नहीं होती) का शिकार हो जाती हैं उन्हें आगे चल कर कभी चेचक नहीं होती। जेनर कुछ मरीज़ों को काओपॉक्स करवा कर उन्हें बचा सका।

हानेमान ने कहा कि इसका मतलब है कि ‘समान, समान का इलाज करता है’ और कि उसके इलाज सब बीमारियों को ठीक कर सकते हैं। उस समय भी दूसरे फिज़ीशियनों ने उसके विचारों को नहीं माना। मगर कई लोगों ने उसे माना भी, इसीलिए वो करोड़पति बन कर मरा।