उत्तर प्रदेश में बूचड़खाना विरोधी अभियान से रोजगार पर असर

साभार: रॉयटर्स/जीतेन्द्र प्रकाश

मांस, चमड़े और पशुधन उद्योगों के उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर, उत्तर प्रदेश में बूचड़खाने के बंद होने का प्रभाव राज्य के लाखों लोगों के रोजगार पर हो सकता है। साथ ही इससे संबधित उद्योग भी प्रभावित हो सकता है और गरीब किसानों के लिए छोटे लेकिन महत्वपूर्ण राजस्व प्रवाहों को प्रभावित करते हैं, विशेष रूप से सूखा प्रभावित क्षेत्रों में।
उत्तर प्रदेश के आधे लाइसेंस प्राप्त और कई अवैध बूचड़खाने नए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के आदेश के बाद बंद कर दिए गए हैं।
बूचड़खानों के खिलाफ अभियान उत्तर प्रदेश में तीन महत्वपूर्ण उद्योगों को प्रभावित करता है। मांस पैकेजिंग, पशुधन और चमड़ा। उत्तर प्रदेश के कुछ विकास संकेतक देश में सबसे बद्तर हैं। स्थिर कृषि और उद्योग इनमें से एक है इसके साथ ही बेरोजगारी दर के संबंध में यह राज्य दूसरे स्थान पर होने के साथ ही यह देश का आठवां सबसे ज्यादा सामाजिक आर्थिक पिछड़ा राज्य भी है। ऐसे में बूचड़खाने बंद होने से बेरोजगारी की समस्या उत्पन्न होने की स्तिथि बनने लगी है।
वर्ष 2015-16 में, उत्तर प्रदेश में प्रति 1,000 लोगों पर ज्यादा लोग बेरोजगार थे। यह संख्या 58 थी, जबकि राष्ट्रीय औसत 37 का रहा है और साथ ही यहां युवा बेरोजगारी भी उच्च थी। उत्तर प्रदेश में 18 से 29 वर्ष की उम्र के बीच प्रति 1,000 लोगों पर 148 लोग बेरोजगार थे। जबकि वर्ष 2015-16 के श्रम मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक भारतीय औसत 102 है।
उत्तर प्रदेश के महत्वूर्ण योगदान के साथ मांस-पैकिंग और चमड़े के उद्योगों में भारत की निर्यात आय का बड़ा हिस्सा है। कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीईडीए) द्वारा प्रकाशित आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2015-16 में भैंस-मांस निर्यात में उत्तर प्रदेश की करीब 43 फीसदी की हिस्सेदारी रही है, जो किसी भी अन्य राज्य की तुलना में सबसे ज्यदा है।
कौंसिल फॉर लेदर एक्सपोर्ट्स (सीएलई) के अनुसार, जो उत्पादन किया जा रहा है उसमें से 46 फीसदी निर्यात करने के साथ भारत के शीर्ष निर्यात अर्जक में से चमड़ा आठवें स्थान पर है। इनमें से एक तिहाई उत्तर प्रदेश के कानपुर से आता है। इस शहर में चमड़ा उद्योग पहले से ही संकट में है।

साभार: इंडियास्पेंड