उत्तराखंड की तबाही का जि़म्मेदार कौन?

Badrinath-flood

उत्तराखंड में मानसून अभी ठीक से आ भी नहीं पाया और तबाही शुरू हो गई। सैकड़ों जानें गईं, हज़ारों लापता हैं। अरबों की सरकारी संपत्ति भारी बरसात में बह गई। सड़क मार्ग और संचार व्यवस्था पूरी तरह ढह गई है।

सरकार इसे प्राकृतिक आपदा कहकर और करोड़ों का राहत पैकेज देकर अपनी जि़म्मेदारी से बचना चाह रही है। लेकिन क्या इस हिमालय क्षेत्र में आई आपदा के कारणों को जानने की कोशिश नहीं की जानी चाहिए? उत्तराखंड में पिछले कई सालों से बाढ़, भूकंप और बादल फटने की घटनाएं हो रही हैं। ऐसा क्यों हुआ है? राज्य में सत्रह नदियां हैं। इनमें पांच सौ से ज़्यादा बांध बनाए जाने के प्रस्ताव पास हो चुके हैं। नदियों के पानी को बांधकर उनसे बिजली बनाए जाने की कई सरकारी योजनाएं शुरू भी हो चुकी हैं। दूसरी तरफ जंगलों को लगातार काटा जा रहा है।

पर्यावरण विशेषज्ञों की मानें तो प्रकृति के साथ ऐसे खिलवाड़ ने ही इस बड़ी आपदा को न्यौता दिया है। आपदा आने के बाद राहत कार्य में भी घोर लापरवाही नज़र आती है। आपदा से निपटने के लिए राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण संस्था बनाई गई है। प्राधिकरण ने साल 2008 में बाढ़ और पहाड़ों की चट्टानों के गिरने से निपटने के लिए अरबों खर्च किए गए। अधिकतर प्रोजेक्ट पर काम तो शुरू हुआ लेकिन बीच में ही अटक गया। खुद प्रधानमंत्री इस प्राधिकरण के प्रमुख हैं। हाल की इस तबाही को लेकर पहले से ही मौसम विभाग ने चेतावनी जारी कर दी थी। लेकिन प्रशासन ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। ऐसे में तबाही का कारण प्रकृति नहीं बल्कि सरकारी की सालों की लापरवाही और सुस्ती है।