आस्था और राजनीति के बीच बाबरी मस्जिद विवाद

साभार: यूट्यूब

6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद ढांचे को ढाह दिया गया था। आज इस घटना को 25 साल हो गए हैं। ये पूरा विवाद 2.77 एकड़ भूमि का है, जिसका हिस्सा बाबरी मस्जिद भी है। इस विवाद के तीन पक्ष हैं, जिन्होंने अलग-अलग समय में इस भूमि पर अपना मालिकाना हक ठोका था। 1955 में रामचन्द्र परमहंस ने, 1959 में निर्माही अखाड़े ने और 1961 में सुन्नी वक्फ बोर्ड ने मालिकाना हक के लिए याचिका दायर की। ये अलग-अलग याचिकाएं ही आगे चलकर एक मुकदमा बन गया। 1992 में बाबरी मस्जिद गिराने के आरोपी लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और उमा भारती सहित कई लोगों पर मुकदमा दर्ज किया गया है। पर यह मुकदमा मालिकाना हक के मुकदमे से अलग है।
मालिकाना हक की बात कहने वाले तीनों पक्षों में रामलला विराजमान और निर्मोही अखाड़ा विवादित स्थल पर मंदिर निर्माण के साथ पूजा के अधिकार की बात कह रहे हैं, तो सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड इस स्थल पर मस्जिद निर्माण की बात कह रहा था। तीनों पक्षों की धार्मिक आस्था इस स्थल से जुड़ी है। तो वहीं भारतीय जनता पार्टी की पूरी राजनीति ही इस विवाद को हवा देने से शुरू हुई है। लेकिन कांग्रेस भी इस विवाद में अपने राजनीति लाभ उठाने के लिए कम कसूरवार नहीं है, क्योंकि भाजपा ने हिंदू वोटों को साधकर अपना जनाधार बनाया, तो वहीं कांग्रेस ने मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए इस विवाद से लाभ लिया था।

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1989 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने विश्व हिन्दू परिषद को मंदिर के शिलान्यास के लिए अनुमति देना एक बड़ी गलती थी, क्योंकि इसके पहले ये स्थान विवादित घोषित कर दिया गया था। इसके बाद 1990 में भाजपा के लालकृष्ण आडवाणी ने रथयात्रा निकाली, जो पूरे देश से होकर अयोध्या में आनी थी। इस रथयात्रा ने देशभर में राम मंदिर निर्माण के लिए ऐसा माहौल तैयार किया, जिसका परिणाम बाबरी मस्जिद ढांचा गिरा। लेकिन उस समय के तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंह राव की भूमिका पर सवाल भी उठे। सूत्रों के अनुसार नरसिंह राव को ये मालूम था कि बाबरी मस्जिद गिराई जा सकती है। लेकिन उन्होंने जानबूझकर इस मुद्दे से आंखें मिच ली थी।
आज ये पूरा मामला देश की सबसे बड़ी अदालत में है। सभी पक्ष फैसले के लिए सुप्रीम कोर्ट की ओर देख रहे हैं, और कुछ समय में इस मुद्दे पर फैसला आ भी जाएगा, लेकिन एक सवाल मन में हैं क्या सभी पक्ष फैसले को सहजता से स्वीकार कर लेंगे?
अयोध्या विवाद एक नजर में-
1528 बाबरी मस्जिद का निर्माण
1853 पहली बार हुआ धार्मिक विवाद
1859 ब्रिटिश शासन ने इस स्थल को हिन्दु और मुसलमानां के लिए अलग-अलग बांटा दिया
1885 महंत रघुवर दास को पास में राम मंदिर निर्माण से रोक गया और मामला अदालत में चला गया
1949 मस्जिद के अन्दर राम की मूर्तियां रखी गई और इस स्थल को विवादित घोषित कर दिया
1989 विवादित स्थल के पास विश्व हिन्दू परिषद ने मंदिर का षिलान्यास किया और तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने इसकी अनुमति  दी।
1990 लालकृष्ण आडवाणी ने रथयात्रा निकाली, जो पूरे देष से होकर अयोध्या में आनी थी।
1991 रथयात्रा की लहर से भाजपा को प्रदेष की सत्ता मिली। साथ ही मंदिर निर्माण के लिए देश भर से ईंटें आई।
6 दिसंबर, 1992 में अयोध्या में हजारों कार सेवकों ने विवादित ढांचे को गिरा दिया। इसके बाद देश भर में सांप्रदायिक दंगे हुए।
16 दिसंबर, 1994 में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ में मुकदमा दर्जा हुआ
4 मई, 2001 में भाजपा नेता लालाकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी सहित 13 नेताओं पर आरोप हटा दिए
1 अप्रैल, 2002 अयोध्या विवादित स्थल पर मालिकाना हक पर इलाहाबाद हाई कोर्ट में सुनवाई शुरु हुई
30 सितंबर, 2010 इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने विवादित स्थल को तीन भागों में बांटा दिया।
9 मई, 2011 सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले पर रोक लगा दी
21 मार्च, 2017 सुप्रीम कोर्ट ने आपसी सहमति से विवाद हल करने की बात कही
19 अप्रैल, 2017 सुप्रीम कोर्ट ने लालकृष्णा आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती सहित कई लोगों पर फौजदारी का मुकदमा चलाने का आदेश दे दिया
5 दिसंबर 2017 को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई, अब अलगी सुनवाई 8 फरवरी को होगी

अलका मनराल