आल्हा उदल के गीत महोबा की शान, और ये गायक भी!

जिला महोबा, गांव बागौल  बरसात की बूंदे अपने संगे लेयाती संगीत की धुन तबई तो कितउ कजरी जैसो मधुर संगीत तो कितउ वीर रस से भरो आल्हा गान बुंदेलखंड की जमीन में सुनाई देन लगत। बुंदेलखंड की सुनो कहानी बुन्देलो की बानी में पानी दार इते को घोड़ा आग इते के पानी में। अबे बुंदेलखंड जाबे में जे पंक्ति आपको बोहतई सुनाई देहे।जिला महोबा, गांव बागौल  बरसात की बूंदे अपने संगे लेयाती संगीत की धुन तबई तो कितउ कजरी जैसो मधुर संगीत तो कितउ वीर रस से भरो आल्हा गान बुंदेलखंड की जमीन में सुनाई देन लगत। बुंदेलखंड की सुनो कहानी बुन्देलो की बानी में पानी दार इते को घोड़ा आग इते के पानी में। अबे बुंदेलखंड जाबे में जे पंक्ति आपको बोहतई सुनाई देहे। जोई हे आल्हा गान आल्हा गान और उदल को बखान और वीरता बता बे में एक रस हे। आदमियन के अनुसार आल्हा और उदल दोई भज्जा भज्जा हते। उनकी वीरता के किस्सा दूर दूर तक फैले ते।सावन और भादौ के महिना में गाय जाबे वाले जो विशेष ज्ञान को जादू। इते एसो हे के आदमियन के रिंगटोन में भी आपको जो सुन बे मिल हे। सुखराम यादव आल्हा गायक चार चार दिन और रात हम अपने घरे नइ  आय गुरु के पास रए उनकी सेवा करत रए। पढ़ाई तो हमाई बोहतई कम हे केवल दो तक पढ़े। और हमाय जो अध्यापक हते बे पांच पास हते और अध्यापक बन गये ते। अब तो पूरी पढ़ाई ही बदल गयी अबे की पढ़ाई तो हमाई समझ में ही नइ आत। सतरह साल की उमर में हमे आल्हा को ज्ञान हो गओ तो। हमने किताबे पड़ी तो हमे लगी के हमे आल्हा सीखने चाहिए गाने चाहिए तो पहले किताबन से सीखो फिर गुरु जी से सीखो। सावन भादौ के महीना हमाय  सीजन होत। इनमे हमाय देहाती प्रोग्राम चलत। ग्रामवासी चंदा इक्ठ्ठा करत फिर हम ओरन को बुलात। हम जालौन, हरिद्वार, लखनऊ, ललितपुर, महरौनी, दिल्ली जात। किसान हे किसानी भी करत जो आल्हा कितने दिन चलत जब कोनऊ प्रोग्राम आ जात तो चले जात नइ तो का करे जासे अपनी किसानी भी करत। और कोनऊ नौकरी तो हे नइया। हर क्षेत्रीय संगीत के संगे होबे वाली बेरुखी जा संगीत के संगे भी भई। आज की युवा पीड़ी जाए फ़िल्मी संगीत के संगे ज्यादा पसंद नइ करत। और बुजुर्गन के बीच गान सावन और भादौ के महीने तक ही सिमट के रह जात। जीसे जा गायन में लगे कलाकार और भी काम में लगे।

रिपोर्टर- सुनीता प्रजापति 

Published on Jul 24, 2017