आलोचना पर इतना हंगामा क्यों?

भारत में लोकतंत्र है। यहां के नागरिकों को बोलने की आजादी है। यहां पर सरकार की नीतियों या किसी नेता या अधिकारी की आलोचना की जा सकती है। यह अधिकार संविधान ने हमें दिए हैं। लेकिन हाल ही में कुछ घटनाएं ऐसी हुईं जिनसे लगता है कि अधिकारों को सीमित करने की कोशिश की जा रही है।

पुणे में एक इंजीनियर की हत्या संदेह के आधार पर एक हिंदूवादी संगठन द्वारा कर दी गई। दरअसल मामला फेसबुक यानी इंटरनेट में इस संगठन के नेता और उनके आदर्श शिवाजी की कुछ आपत्तिजनक फोटो डालने का था। यह इंजीनियर खास समुदाय का था, और उनके हाथ लग गया तो इसे पीट पीटकर मार डाला गया। यह घटना सांप्रदायिक भावना को उकसाने और बोलने की आजादी पर लगाम लगाने वाली है। दूसरी घटना केरल के एक पॉलिटेक्निक कॉलेज की है। यहां से निकलने वाली एक मैग्जीन में दुनियाभर के कुछ नाकारात्मक छवि वाले लोगों की एक सूची छपी थी। इसमें नरेंद्र मोदी का नाम भी था। इस बात पर वहां के एक हिंदूवादी संगठन ने हंगामा किया। पुलिस को फौरन इन छात्रों और संपादक समेत लेआउट डिजायनर को हिरासत में लेना पड़ा। हालांकि उन्हें कुछ देर बाद छोड़ भी दिया गया।

नरेंद्र मोदी ने इन दोनों मसलों में बस इतना कहा कि यह घटनाएं दुर्भाग्यपूण हैं। तो क्या यह मान लेना चाहिए कि इस नई सरकार में आलोचना की कोई जगह नहीं है? अगर ऐसा है तो फिर यह लोकतंत्र पर खतरा है। धर्मनिरपेक्षता की धारणा और बोलने की आजादी के खिलाफ है। नई सरकार के मुखियाओं को सामने आकर इन घटनाओं के लिए जिम्मेदार संगठनों के खिलाफ सख्त कार्यवाही का भरोसा दिलाना चाहिए न कि चुप्पी साधनी चाहिए।