आपातकालीन स्थिति में भारत की वापसी!

पिछले कई महीनों से देश में लगातार आपातकालीन जैसे हालात बनते जा रहे हैं। देश के सभी बड़े विश्वविद्यालयों में शिक्षा पद्धति को निशाना बना छात्रों के दमन की प्रक्रिया ने जोर पकड़ लिया है। सहमती पर बढ़ते विरोध, छात्रों पर होते हमले और विश्वविद्यालय परिसर में अराजकता फैलाकर छात्रों के मौलिक अधिकारों का हनन किया जा रहा है।
इसका ताजा उदहारण है हैदराबाद विश्वविद्यालय, जहां रोहिथ वेमुला की मृत्यु के बाद अचानक छुट्टी पर गये कुलपति अप्पा राव जब वापस आये तो उनके विरोध में विश्वविद्यालय के छात्र उनके कार्यालय के सामने धरने पर बैठ गये। छात्रों को हटाने के लिए प्रोफेसर ने पुलिस के द्वारा उन पर बर्बर लाठीचार्ज कराया।
यहां कुलपति राव का रवैया छात्रों के प्रति क्रूर नजर आता है। कैसा होता यदि कुलपति राव छात्रों से बातचीत कर मसले को सुलझाने की कोशिश करते? लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया बल्कि छात्रों के खाना, पानी, इंटरनेट आदि जरुरी चीजों पर भी रोक लगा दी। भारी लाठीचार्ज में न सिर्फ छात्रों को बुरी तरह से मारा गया बल्कि उन्हें और धरने में शामिल प्रोफेसर्स को गिरफ्तार भी किया गया।
ऐसा क्यों होता जा रहा है कि हमारे विश्वविद्यालय हादसों की जाँच-पड़ताल करने की जगह छात्रों को ही कटघरे में लाकर खड़ा कर रहे हैं? क्यों हर मसले को पुलिस के हवाले कर छात्रों को प्रताडि़त किया जा रहा है?
सिर्फ यही नहीं, छत्तीसगढ़ में भी कुछ ऐसा ही राजनीतिकरण देखने को मिलता है। पिछले कुछ महीनों में पत्रकारों, वकीलों और समाज सेवकों पर हमले बढ़ते जा रहे हैं। लोगों की आवाज बंद करने, उनके सोचने और समझने पर पुलिस का डंडा लगातार बरसता जा रहा है। सोनी सोरी के मामले में भी पुलिस का घिनौना चेहरा सामने आया।
अभी हालिया में हुई बस्तर में एक के बाद एक पत्रकारों की गिरफ्तारी से पुलिस पर सवाल खड़े हो रहे हैं कि क्या नक्सलियों की आड़ में छत्तीसगढ़ सरकार प्रेस की आवाज दबाना चाहती है? क्या सच में देश आपातकालीन स्थति में पहुंच रहा है?