आतंकवाद से निपटना नहीं है आसान

पाकिस्तान के पेषावर षहर के स्कूल में हुई दुखद घटना ने पूरी दुनिया को षोक और सदमे में डाल दिया है। पिछले कुछ सालों में आतंकवादियों का इस बेरहमी से स्कूली बच्चों को निषाना बनाना आष्चर्य की बात तो है ही पर साथ ही लोगों के दिलों में बढ़ती नफरत का खतरनाक संकेत है।
देखा जाए तो पाकिस्तान कोई अकेला देष नहीं है जहां ऐसा हमला हुआ हो। 2004 में रूस के बेसलान षहर के एक स्कूल में आतंकवादियों ने लगभग चार सौ लोगों को मारा था। 2014 में अफ्रीका के नाइजीरिया देष के आतंकी गुट ‘बोको हराम’ ने ढाई सौ से ज़्यादा स्कूली छात्राओं को अगवाह करा था। इन सभी हमलों में आतंकी गुटों ने अपना बदला बच्चों पर हमला करके, देष के भविश्य पर सीधा वार किया।
आतंकवाद चाहे जिस देष में हो, भले ही किसी मज़हब के नाम पर इसका स्पश्टीकरण दिया जाए, मानवता पर यह हमला हर देष के लिए गंभीर और जटिल मुद्दा है। आतंकवाद को एक राजनीतिक मुद्दे के रूप में देखना भी ज़रूरी है जिसमें कई देष और कई सरकारों का भी हाथ है।
2004 के बाद रूस ने आतंकवाद के खिलाफ नई और और कड़ी नीतियां बनाई थीं। जून 2014 में पाकिस्तान ने जब तालिबान के खिलाफ युद्ध छेड़ा तो दिसंबर में पेषावर में तालिबान ने यह हमला किया। इसके बाद दोबारा सरकार आतंकवाद से लड़ने के लिए फांसी की सज़ा जैसे कदम उठाने के बारे में सोच रही है।
यह समझना ज़रूरी है कि आतंकवाद को बढ़ावा देने में अमरीका, इज़राइल जैसे अमीर देषों का भी हाथ है। इन देषों से ही छोटे-छोटे देषों में बंदूकें और कारतूस गलत हाथों में पहुंचते हैं। कड़ी नीतियों और मौत की सज़ा ऐसे आतंकवाद को सुलझाने में असफल रही हैं और आगे भी रहेंगी।