आज जो रोटी खाते हो, उसके पीछे इन जनाब का हाथ था!

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पंजाब में गेहूं की क्रांति लाने वाले डॉ. दिलबाग सिंह अठवाल का अमेरिका के न्यू जर्सी में निधन हो गया। वह 89 वर्ष के थे।

जालंधर के लांबड़ा के नजदीक गांव कल्याणपुर में जन्मे डॉ. अठवाल ने फसलों में कई बड़ी नस्लों की खोज की। जिससे उन्हें विश्व स्तर पर ख्याति मिली।

डॉ. अठवाल उन बड़े कृषि वैज्ञानिकों में एक थे जिन्होंने देश की हरित क्रांति के लिए गेहूं की पीवी 18 व कल्याण किस्में खोज निकाली थीं। इस किस्म के नाम से ही उनके गांव का नाम कल्याणपुर रखा गया है। इसके बाद इन्होंने दिल्‍ली के भारतीय कृषि अनुसन्धान केंद्र के साथ मिलकर गेहूं की कल्याण सोना किस्म तैयार की।

इन्हीं वरायटियों के फलस्वरूप वर्ष 1960-61 की तुलना में पंजाब में वर्ष 1970-71 में गेहूं की पैदावार तीन गुना बढ़ गई थी। वर्ष 1960-61 में गेहूं की औसत पैदावार 12.44 क्विंटल प्रति हेक्टेयर थी। कल्याण वरायटी से पैदावार बढ़कर 1970-71 में 22.37 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक पहुंच गई। वह वर्ष 1967 में अंतरराष्ट्रीय चावल अनुसन्धान केंद्र, मनीला फिलीपिंस में काम करने लगे।

बाजरे की पहली उच्चकोटि की किस्म विश्व को दी गई उनकी एक बड़ी देन है। यही नहीं, जीवविज्ञान में बेहतरीन कार्य के लिए भारत सरकार द्वारा वर्ष 1975 में उन्हें पदम भूषण सम्मान से सम्मानित भी किया था।

कृषि क्षेत्र में दिए गए बहुमूल्य योगदान के चलते डॉ. दिलबाग सिंह अठवाल को वर्ष 1955 में उन्हें सिडनी की यूनिवर्सिटी ने डॉक्टर ऑफ फिलॉसफी की डिग्री से नवाजा।

वर्ष 1964 में उन्हें कृषि खोज कार्यों में उम्दा व उत्कृष्ट प्रदर्शन के चलते शांति स्वरूप भटनागर सम्मान मिला। यह सम्मान भारत में विज्ञान के क्षेत्र में सबसे बड़ा सम्मान है।